Tag: ज्योतिष विचार

  • ग्रहों का भेद

    ग्रहों का भेद

    सबसे पहले यह बताते हैं कि किस ग्रह से क्या विचार करना चाहिए – किस वस्तु का कौन-सा ग्रह कारक है। किस भाव से क्या-क्या विचार करना चाहिए,

    इससे यह भी सिद्ध होता है कि जो बात भाव से विचार की जावे वह भाव के स्वामी से भी विचार करना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि छठे भाव से शत्रु का विचार किया जाता है तो छठे भाव के स्वामी से भी शत्रु का विचार करना चाहिए।

    यह तो भाव का मालिक होने के कारण उस ग्रह में विशेषता आई। परन्तु उसका अपना साधारण गुण क्या है?

     मान लीजिए दस आदमियों की कुण्डली में सूर्य अलग-अलग दस भावों का स्वामी है। जिसमें लग्न का स्वामी है उसमें लग्नेश का प्रभाव दिखावेगा, जिसमें धन स्थान का स्वामी है उसमें घनेश का प्रभाव दिखावेगा उचित ही है।

    सूर्य

    परन्तु सूर्य का अपना स्वाभाविक गुण धर्म क्या है? तांबा, सोना, पिताः, शुभ फल, (अर्थात् अपना शुभ), धैर्य, शौर्य, (पराक्रम) युद्ध में विजय, आत्मा, सुख, प्रताप, राजसेवा, शक्ति, प्रकाश, भगवान शिव सम्बन्धी कार्य, वन (जंगल) या पहाड़ में यात्रा, होम (हवन) कार्य में प्रवृत्ति,

    देवस्थान (मन्दिर) तीक्ष्णता, उत्साह आदि का विचार बुद्धिमान् मनुष्य सूर्य से करें। अर्थात् सूर्य उपयुक्त का कारक है।

    चंद्रमा

    माता का कुशल, चित्त की प्रसन्नता, समुद्र स्नान, सफेद चंवर (या सफेद वस्तु और चंवर), छत्र, सुन्दर पंखे (राज चिह्न फल, पुष्प, मुलायम वस्तु, खेती, अन्न

    कीर्ति (यश), मोती, चाँदी, काँसा, दूध, मधुर पदार्थ, वस्त्र, जल, गाय, स्त्री प्राप्ति, सुखपूर्वक भोजन, रूप (सुन्दरता) – इनके संबंध का फलादेश चंद्रमा से कहना चाहिए। चंद्रमा इन सब का कारक है।

    मंगल

    अब यह बताते हैं कि मंगल से किन-किन वस्तुओं का विचार करें। (शारीरिक और मानसिक ताक़त) पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले पदार्थ, भाई-बहिनों के गुण (भाई-बहिनों का सुख कैसा रहेगा), क्रूरता, रण, साहस, विद्वेष (शत्रुता), रसोई की अग्नि, सोना, ज्ञाति (जाति के लोग–दायाद),

    अस्त्र, चोर, शत्रु, उत्साह, दूसरे पुरुष की स्त्री में रति, मिथ्या भाषण, वीर्य (ताकत, पराक्रम), चित्त की समुन्नति (चित्त का उत्साह, उदारता; बहादुरी या ऊंचापन), कालुष्य (पाप या बुरा काम), व्रण (घाव), चोट, सेनाधिपत्य आदि का विचार मंगल से करें।

    बुध

    बुध किन बातों पर विशेष प्रभाव डालता है या यूँ कहें कि बुध किन वस्तुओं का विशेष अधिष्ठाता है? पाण्डित्य, अच्छी वाक् शक्ति (बोलने की शक्ति), कला, निपुणता, विद्वानों द्वारा स्तुति, मामा, वाक्-चातुर्य, उपासना आदि में पटुता (चतुरता), विद्या में बुद्धि का योग, बुद्धि

    (बुद्धिमान होना अलग बात है और विद्या में बुद्धि लगाये रहना), पृथक् बात है यज्ञ, भगवान विष्णु सम्बन्धी धार्मिक कार्य, सत्य वचन, सीप, विहार स्थल (आमोद-प्रमोद की जगह), शिल्प (तथा शिल्प कार्य में चतुरता), बन्धु, युवराज, मित्र, भानजा, भानजी आदि का विचार बुध से करें।

    बृहस्पति

    अब बृहस्पति किन-किन का कारक है:: ज्ञान: अच्छे गुण, पुत्र, मंत्री, अच्छा आचार (आचरण), या अपना आचरण (चरित्र, कार्य), आचार्यत्व (पढ़ाना या दीक्षा देना) माहात्म्य (आत्मा का महान् होना), श्रुति (वेद) शास्त्र, स्मृति आदि का ज्ञान,

    सब की उन्नति, सद्गति, देवताओं और ब्राह्मणों की भक्ति, यज्ञ, तपस्या, श्रद्धा, खजाना, विद्वत्ता, जितेन्द्रियता, सम्मान, दया आदि का विचार बृहस्पति से करें। विशेष यह है कि यदि स्त्री की जन्मकुण्डली का विचार करना हो तो पति सुख का विचार भी बृहस्पति से करना चाहिए।

    शुक्र

    सम्पत्ति, सवारी, वस्त्र, भूषण, निवेश में रखे हुए द्रव्य, तौयंत्रिक (नाचने, गाने तथा बाजे का योग), सुगन्धि, पुष्प, रति (स्त्री, पुरुष प्रसंग), शय्या (पलंग) और उससे संबंधित व्यापार, मकान, धनिक होना, अर्थात् वैभव, कविता का सुख, विलास, मंत्रित्व (मिनिस्टर होना), सरस उक्ति, विवाह या अन्य शुभ कर्म, उत्सव आदि का विचार शुक्र से करें।

    शनि

    आयु, मरण, भय, पतन (किसी ऊँचे स्थान से गिरना या सम्मान छूटना, जातिच्युति आदि होना), अपमान, बीमारी, दुःख, दरिद्रता, बदनामी, पाप, मजदूरी, अपवित्रता, निन्दा, आपत्ति, कलुषता (मन का साफ न होना, निन्दा, निन्दित कर्म आदि),

    आपत्ति, मरने का सूतक, स्थिरता, नीच व्यक्तियों का आश्रय, भैंस, तन्द्रा (आलस्य, ऊँघना), लोहे की वस्तु, नौकरी, दासता, जेल जाना, गिरफ्तार होना, खेती के साधन आदि का विचार शनि से करें।

  • नक्षत्रों की आकर्षक दुनिया: एक अद्वैत अनुभव

    नक्षत्रों की आकर्षक दुनिया: एक अद्वैत अनुभव

    “नक्षत्र की खोज से खुलेगा आपका पूरा व्यक्तित्व: अपने अंदर छिपी विशेषताओं का आभास करें और बदलें अपना जीवन”

    नक्षत्र क्या है

    तारागण में से ही कतिपय को वृद्धों ने नक्षत्र नाम से पुकारा है। यदि हमें एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़े और उस स्थान तक पहुँचने के लिये सड़क भी हो, तो जब तक उस सड़क का विभाग किसी रीति से, जैसे कोस या मील द्वारा, न किया जाय तब तक यह कहना कि अमुक घटना उस सड़क पर चलते हुए. किस स्थान में हुई थी, बड़ा ही कठिन होगा। इसलिये सड़कों को माइलों में विभक्त करने की प्रणाली है और प्रति माइल को भी चार भागों में बाँटकर ३ इत्यादि चिह्न दे दिया जाता है । इन चिह्नों के द्वारा किसी घटना के स्थान को बड़ी सरलता से बतलाया जा सकता है। जैसे अमुक घटना नव माइल तय करने पर दसवें माइल के चतुर्थांश अथवा अर्द्धांश पर हुई ।

    अतएव महर्षियों ने आकाश मण्डल के तारों को पूर्व-पश्चिम गति से सत्ताईस भागों में विभक्त किया है; तथा प्रति भाग का नाम नक्षत्र रक्खा है। इसलिये यदि आप ध्यान देकर देखेंगे तो यह प्रतीत होगा कि इन सत्ताईस नक्षत्रों की एक माला पृथ्वी के चारों ओर पूर्वापर (पूरब से पश्चिम, उत्तर दक्षिण नहीं) पड़ी हुई है।

    कई तारों के समुदाय को ही नक्षत्र कहते हैं। उन तारों को एक दूसरे से युक्ति- पूर्वक रेखा द्वारा मिला देने से कहीं अश्व, कहीं शिर, कहीं गाड़ी और कहीं सर्पादि का चित्र बन जाता है। इन नक्षत्रादि के नामकरण पर विशेष लिखने की यहाँ आवश्यकता नहीं। तात्पर्य यही है कि इस भूमण्डल के चारों ओर जो तारागण हैं, जिन्हें महर्षियों ने सत्ताईस नक्षत्रों के नाम से पुकारा है,

    उनके द्वारा आकाश-मण्डल में ग्रहों की स्थिति का ठीक-ठीक बोध होता है। जैसे सड़क के पथिक को मील चिह्न से यह कहना सुगम होता है कि अमुक दूरी पर पहुँच गया, उसी तरह गणितज्ञों को यह कहना सरल होगा कि अमुक ग्रह, अमुक समय में, अमुक नक्षत्र में था या है

    नक्षत्रों के विभाग

     प्रत्येक नक्षत्र चार भागों में विभाजित हैं और उनमें हर एक को चरण कहते हैं। इस प्रकार भाग करने से यह हुआ कि ग्रह की स्थिति केवल इतना ही कहकर समाप्त न की जायगी कि अमुक ग्रह अमुक नक्षत्र में था या है बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि वह ग्रह उस नक्षत्र के किस चरण में है ।

    अब प्रश्न यह उठ सकता है कि किस ग्रह की स्थिति किस समय किस नक्षत्र के किस चरण में थी, है या होगी, इसके जानने की विधि क्या है ? यह विषय बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और इस पर सूर्य सिद्धान्त, ग्रहलाघव, आर्यसिद्धान्त आदि बहुत-सी पुस्तकें हैं । पर उन पुस्तकों की सहायता बिना सब बातें किसी शुद्ध पंचांग में भी मिल जाती हैं।

    किसी पंचाङ्ग को यदि आप उठाकर देखेंगे तो आपको यह पता चल जायगा कि अमुक ग्रह अमुक समय में अमुक नक्षत्र के अमुक चरण में है। पंचाङ्ग देखने की रीति जहाँ बतलायी गयी है वहाँ इन बातों को दृष्टान्त देकर पूर्ण रीति से समझा देने का यत्न किया गया है।

    इस स्थान में अब इतना ही लिखना आवश्यक है कि पृथ्वी के चारों ओर तथा पूरब से पश्चिम जाती हुई मालाकार सत्ताईस नक्षत्र हैं। प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण हैं। अतएव मालाकार नक्षत्रों में कुल १०८ (२७x४) चरण हैं ।

    इस सम्बन्ध में एक बात और स्मरण रखने की है कि महर्षियों ने इस मालारूपी तारों (नक्षत्रों) को बारह राशियों में विभक्त किया है। पहिले लिखा जा चुका है कि इस माला में एक सौ आठ चरण हैं। यदि इसकी बारह राशियाँ बनायी जायँ अर्थात् इसको बारह जगहों में बाँटें, तो नौ नौ चरणों की या यों कहें कि २४ सवा दो नक्षत्रों की एक राशि हुई। अब यदि हमको यह मालूम हो कि अमुक ग्रह अमुक समय में अमुक नक्षत्र के अमुक चरण में था, तो इतना जानने के पश्चात् बड़ी सुगमता से यह जाना जा सकता है कि वह ग्रह किस राशि में था !

    नक्षत्र एवं राशियों के नाम

    राशिनक्षत्र(चरण अक्षर)नक्षत्र(चरण अक्षर)नक्षत्र(चरण अक्षर)
    मेषअश्विनी(चू चे चो ला)भरणी(ली लू ले लो)कृत्तिका(अ)
    वृषभकृत्तिका(इ उ ए)रोहिणी(ओ वा वी वु )मृगशिरा(वे बो)
    मिथुनमृगशिरा(का की)आर्द्रा(कु घ ङ. छ)पुनर्वसु(के हो हा)
    कर्कपुनर्वसु(ही)पुष्य(हु हे हो डा)आश्लेषा(डी डु डे डो)
    सिंहमघा(मा मी मू मे)पूर्वा फाल्गुनी(मो टा टी टू)उत्तरा फाल्गुनी(टे)
    कन्याउत्तरा फाल्गुनी(टो पा पी)हस्त(पु ष ण ठ)चित्रा(पे पो)
    तुलाचित्रा(रा री)स्वाती(रु रे रो ता)विशाखा(ती तू ते)
    वृश्चिकविशाखा(तो)अनुराधा(ना नी नू ने)ज्येष्ठा( नो या यि यू)
    धनुमूला(ये यो भा भी)पूर्वाषाढ़ा(भु धा फा ड़ा)उत्तराषाढ़ा(भे)
    मकरउत्तराषाढ़ा(भो जा जी )श्रवणा(खी खू खे खो)धनिष्ठा(गा गी)
    कुम्भधनिष्ठा(गू गे)शतभिषा(गो सा सी सू)पूर्वभाद्र(से सो दा)
    मीनपूर्वभाद्र( दी)उत्तरभाद्र(दू थ झ ञ)रेवती(दे दो चा ची)

     इस विषय को सुगमता से समझने के लिये एक चक्र दिया जाता है जिसके अवलोकन मात्र से पूर्व लिखी हुई बातें हस्तामलक हो जायँगी ।

    नक्षत्रों के प्रत्येक चरण को ज्योतिष शास्त्र में वर्णमाला के एकैक अक्षर से विख्यात किया है। तात्पर्य यह कि प्रति चरण का एक सौ आठ नाम नहीं देकर केवल अक्षरों से ही उनका बोध कराया गया है।

    नक्षत्रों का आरम्भ अश्विनी से होता है । अश्विनी का प्रथम चरण ‘चु’, द्वितीय ‘चे’, तृतीय ‘चो’ और चतुर्थ ‘ला’ । भरणी का प्रथम चरण ‘ली’, द्वितीय ‘लु’, तृतीय ‘ले’ और चतुर्थ ‘लो’ | कृत्तिका का प्रथम चरण ‘अ’, द्वितीय ‘इ’, तृतीय ‘उ’ एवं चतुर्थ ‘ए’ है ।

    इसी प्रकार २७ नक्षत्र के प्रत्येक चरण को वर्णमाला का एक अक्षर अकार इकारादि युक्त दिया गया है।

     देखने से यह बोध होता है कि किस नक्षत्र के किस चरण का कौन अक्षर होता है। ज्योतिष में इसका प्रयोग इस प्रकार होता है। जैसे किसी व्यक्ति का जन्म उत्तरा नक्षत्र के तृतीय चरण में हो तो उसका (राशि) नाम ऐसा रक्खा जाता है जिसका प्रथम अक्षर ‘प’ अथवा ‘पा’ हो । (ह्रस्व दीर्घ में भेद नहीं माना जाता है) ।

    जैसे पद्मराग मिश्र अथवा पार्वतीदेवी इत्यादि । इसी रीति से यदि यह मालूम हो कि अमुक व्यक्ति का राशिनाम नर्मदेश्वर शर्मा है तो चक्र में देखने से तुरत बोध हो जायगा कि उस व्यक्ति का जन्म अनुराधा के प्रथम चरण में है। इसी प्रकार और सब भी जानना होगा।