Category: Astrology

  • ग्रहों का भेद

    ग्रहों का भेद

    सबसे पहले यह बताते हैं कि किस ग्रह से क्या विचार करना चाहिए – किस वस्तु का कौन-सा ग्रह कारक है। किस भाव से क्या-क्या विचार करना चाहिए,

    इससे यह भी सिद्ध होता है कि जो बात भाव से विचार की जावे वह भाव के स्वामी से भी विचार करना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि छठे भाव से शत्रु का विचार किया जाता है तो छठे भाव के स्वामी से भी शत्रु का विचार करना चाहिए।

    यह तो भाव का मालिक होने के कारण उस ग्रह में विशेषता आई। परन्तु उसका अपना साधारण गुण क्या है?

     मान लीजिए दस आदमियों की कुण्डली में सूर्य अलग-अलग दस भावों का स्वामी है। जिसमें लग्न का स्वामी है उसमें लग्नेश का प्रभाव दिखावेगा, जिसमें धन स्थान का स्वामी है उसमें घनेश का प्रभाव दिखावेगा उचित ही है।

    सूर्य

    परन्तु सूर्य का अपना स्वाभाविक गुण धर्म क्या है? तांबा, सोना, पिताः, शुभ फल, (अर्थात् अपना शुभ), धैर्य, शौर्य, (पराक्रम) युद्ध में विजय, आत्मा, सुख, प्रताप, राजसेवा, शक्ति, प्रकाश, भगवान शिव सम्बन्धी कार्य, वन (जंगल) या पहाड़ में यात्रा, होम (हवन) कार्य में प्रवृत्ति,

    देवस्थान (मन्दिर) तीक्ष्णता, उत्साह आदि का विचार बुद्धिमान् मनुष्य सूर्य से करें। अर्थात् सूर्य उपयुक्त का कारक है।

    चंद्रमा

    माता का कुशल, चित्त की प्रसन्नता, समुद्र स्नान, सफेद चंवर (या सफेद वस्तु और चंवर), छत्र, सुन्दर पंखे (राज चिह्न फल, पुष्प, मुलायम वस्तु, खेती, अन्न

    कीर्ति (यश), मोती, चाँदी, काँसा, दूध, मधुर पदार्थ, वस्त्र, जल, गाय, स्त्री प्राप्ति, सुखपूर्वक भोजन, रूप (सुन्दरता) – इनके संबंध का फलादेश चंद्रमा से कहना चाहिए। चंद्रमा इन सब का कारक है।

    मंगल

    अब यह बताते हैं कि मंगल से किन-किन वस्तुओं का विचार करें। (शारीरिक और मानसिक ताक़त) पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले पदार्थ, भाई-बहिनों के गुण (भाई-बहिनों का सुख कैसा रहेगा), क्रूरता, रण, साहस, विद्वेष (शत्रुता), रसोई की अग्नि, सोना, ज्ञाति (जाति के लोग–दायाद),

    अस्त्र, चोर, शत्रु, उत्साह, दूसरे पुरुष की स्त्री में रति, मिथ्या भाषण, वीर्य (ताकत, पराक्रम), चित्त की समुन्नति (चित्त का उत्साह, उदारता; बहादुरी या ऊंचापन), कालुष्य (पाप या बुरा काम), व्रण (घाव), चोट, सेनाधिपत्य आदि का विचार मंगल से करें।

    बुध

    बुध किन बातों पर विशेष प्रभाव डालता है या यूँ कहें कि बुध किन वस्तुओं का विशेष अधिष्ठाता है? पाण्डित्य, अच्छी वाक् शक्ति (बोलने की शक्ति), कला, निपुणता, विद्वानों द्वारा स्तुति, मामा, वाक्-चातुर्य, उपासना आदि में पटुता (चतुरता), विद्या में बुद्धि का योग, बुद्धि

    (बुद्धिमान होना अलग बात है और विद्या में बुद्धि लगाये रहना), पृथक् बात है यज्ञ, भगवान विष्णु सम्बन्धी धार्मिक कार्य, सत्य वचन, सीप, विहार स्थल (आमोद-प्रमोद की जगह), शिल्प (तथा शिल्प कार्य में चतुरता), बन्धु, युवराज, मित्र, भानजा, भानजी आदि का विचार बुध से करें।

    बृहस्पति

    अब बृहस्पति किन-किन का कारक है:: ज्ञान: अच्छे गुण, पुत्र, मंत्री, अच्छा आचार (आचरण), या अपना आचरण (चरित्र, कार्य), आचार्यत्व (पढ़ाना या दीक्षा देना) माहात्म्य (आत्मा का महान् होना), श्रुति (वेद) शास्त्र, स्मृति आदि का ज्ञान,

    सब की उन्नति, सद्गति, देवताओं और ब्राह्मणों की भक्ति, यज्ञ, तपस्या, श्रद्धा, खजाना, विद्वत्ता, जितेन्द्रियता, सम्मान, दया आदि का विचार बृहस्पति से करें। विशेष यह है कि यदि स्त्री की जन्मकुण्डली का विचार करना हो तो पति सुख का विचार भी बृहस्पति से करना चाहिए।

    शुक्र

    सम्पत्ति, सवारी, वस्त्र, भूषण, निवेश में रखे हुए द्रव्य, तौयंत्रिक (नाचने, गाने तथा बाजे का योग), सुगन्धि, पुष्प, रति (स्त्री, पुरुष प्रसंग), शय्या (पलंग) और उससे संबंधित व्यापार, मकान, धनिक होना, अर्थात् वैभव, कविता का सुख, विलास, मंत्रित्व (मिनिस्टर होना), सरस उक्ति, विवाह या अन्य शुभ कर्म, उत्सव आदि का विचार शुक्र से करें।

    शनि

    आयु, मरण, भय, पतन (किसी ऊँचे स्थान से गिरना या सम्मान छूटना, जातिच्युति आदि होना), अपमान, बीमारी, दुःख, दरिद्रता, बदनामी, पाप, मजदूरी, अपवित्रता, निन्दा, आपत्ति, कलुषता (मन का साफ न होना, निन्दा, निन्दित कर्म आदि),

    आपत्ति, मरने का सूतक, स्थिरता, नीच व्यक्तियों का आश्रय, भैंस, तन्द्रा (आलस्य, ऊँघना), लोहे की वस्तु, नौकरी, दासता, जेल जाना, गिरफ्तार होना, खेती के साधन आदि का विचार शनि से करें।

  • ग्रहों की मैत्री का अद्भुत रहस्य

    ग्रहों की मैत्री का अद्भुत रहस्य

    ग्रहों के बीच में मित्रता और शत्रुता होती है, इसे महर्षियों ने कहा है। लेकिन यह न समझें कि ग्रहों के बीच वास्तविक झगड़ा या मित्रता होती है।

    महर्षियों ने आदर्शदृष्टि के माध्यम से जाना है कि एक ग्रह की किरणें कभी-कभी दूसरे ग्रह की किरणों की मदद करती हैं, कभी विरोध करती हैं और कभी न विरोध होता है, अर्थात् समानता बनी रहती है।

    सत्याचार्यजी ने ग्रहों के मित्रत्व आदि के बारे में एक रहस्यमय श्लोक में यह कहा है:

    “सुहृदस्त्रिकोण भवनाद्गृस्य सुतभे(5) व्ययेऽथ(12) धनभवने(2)।

     स्वजने(4) निधने(8) धर्मे(9) स्वोच्चे च भवन्ति नो शेषाः॥”

    इसका अर्थ है कि ग्रह अपने मूलत्रिकोण से 2,4,5,8,9 और 12 भावों के और अपने उच्च स्थान के स्वामी को मित्र बनाते हैं, अन्यथा नहीं। इसे व्याख्यान करते हुए यह कहा जा सकता है कि ग्रह अपने मूलत्रिकोण से द्वितीय और द्वादश, पंचम और नवम तथा चतुर्थ और अष्टम स्थान के स्वामियों को बुलाते हैं।

    (यहां बुलाने का अर्थ यह है कि उक्त स्थानों के स्वामियों की किरणों से उस मूलत्रिकोणवाले ग्रह की किरणों को सहायता मिलती है)। यदि उक्त ग्रह को दो बार बुलाया जाता है, तो वह उस मूलत्रिकोण वाले ग्रह का स्वाभाविक मित्र बन जाता है और एक बार बुलाने पर स्वभावतः समान हो जाता है। वैसे ही, बिना बुलाए गए ग्रह शत्रु होते हैं।

    हालांकि, इसमें विशेषता यह है कि सूर्य और चंद्रमा (जो राजा और रानी हैं) एक ही बार बुलाए जाने पर मित्र बन जाते हैं। नीचे दिए गए चक्र में ग्रहों को उनके मूलत्रिकोण में स्थापित किया गया है।

    मूलत्रिकोण चक्र

    सूर्य का सिंह मूलत्रिकोण है। उससे २वें स्थान का स्वामी बुध है, 4वें स्थान का मंगल है, 5वें स्थान का बृहस्पति है, 8वें स्थान का बृहस्पति है, 9वें स्थान का मंगल है, और 12वें स्थान का चंद्रमा है।

    सूर्य मेष में उच्च है और उसका स्वामी मंगल होता है। अब देखने में यह आता है कि मंगल एवं बृहस्पति दो बार निमंत्रित हुए। अतः ये दोनों और चंद्रमा (एक ही बार निमंत्रित होने से) सूर्य के मित्र हुए। बुध को केवल एक ही बार निमंत्रण है, इस कारण यह सम, और शुक्र एवं शनि अनिमंत्रित रहने के कारण शत्रु हुए।

    पुनः चंद्रमा का वृष मूलत्रिकोण है। इससे २ स्थान का स्वामी बुध, 4वें स्थान का शुक्र, 5वें स्थान का बुध, 8वें स्थान का बृहस्पति, 9वें स्थान का शनि, 12वें स्थान का मंगल और उच्चस्थान का शुक्र है।

    ग्रहसूर्यचंद्रमामंगलबुधबृहस्पतिशुक्रशनि
    मित्र चंद्रमा,मंगल,
    बृहस्पति
    सूर्य,बुधचंद्रमा,सूर्य,
    बृहस्पति
    सूर्य, शुक्रसूर्य,चंद्रमा,
    मंगल
    बुध,शनिशुक्र,बुध
    समबुधबृहस्पति,मंगल,
    शुक्र,शनि
    शुक्र,शनिबृहस्पति,मंगल,शनिशनिबृहस्पति,मंगल,बृहस्पति
    शत्रुशुक्र,शनिबुधचंद्रमाशुक्र,बुधसूर्य,चंद्रमासूर्य,चंद्रमा,
    मंगल

    अतः बुध और सूर्य मित्र, बृहस्पति, शनि, मंगल और शुक्र सम और शत्रु कोई नहीं। इसी प्रकार और सभी ग्रहों का भी जानना होगा।

  • ग्रहों के उच्च-नीच से जुड़ी रहस्यमयी बातें! ज्योतिष के अनोखे पहलू

    ग्रहों के उच्च-नीच से जुड़ी रहस्यमयी बातें! ज्योतिष के अनोखे पहलू

    भारतीय ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ग्रहों के आधार पर हमारे जीवन में विभिन्न प्रभाव देखे जाते हैं, और इनकी स्थिति राशि में उच्च या नीच होने के आधार पर उनके फल का निर्धारण किया जाता है। इस लेख में हम देखेंगे कि किस राशि के स्वामी ग्रह किस राशि में उच्च और नीच होते हैं, और उनके उच्च-नीच होने का अर्थ क्या होता है।

    ज्योतिष ग्रंथों में यह बताया गया है कि कुछ ग्रह कुछ राशियों में उच्च और नीच होते हैं। उच्च ग्रह वह होते हैं जो राशि में उच्च होते हैं, उन्हें वहाँ बहुत बल मिलता है और उससे फल प्राप्त होता है। उदाहरण के तौर पर, सूर्य मेष राशि में उच्च होता है, चंद्रमा वृष राशि में, मंगल मकर राशि में, बुध कन्या राशि में, बृहस्पति कर्क राशि में, शुक्र मीन राशि में और शनि तुला राशि में।

    इसी तरह, कुछ ग्रह सप्तम राशि में उच्च होने के बजाय नीच स्थान प्राप्त करते हैं। उच्च राशि के साथ सप्तम राशि में ग्रह का नीच स्थान होता है। जब ये ग्रह अपने उच्च स्थान से सप्तम राशि के इन भागों पर जाते हैं, तो उन्हें परम नीच कहा जाता है। इस प्रकार, सूर्य के लिए मेष की 10वीं भाग पर उच्च स्थान होता है और तुला की 10वीं भाग पर परम नीच स्थान होता है।

    यह उच्च और नीच ग्रहों का नामकरण ग्रहों की विशेषता है, और इसका महत्वपूर्ण असर हमारे जीवन पर पड़ता है। यहाँ उच्च ग्रह को “तुंग” भी कहा जाता है। उच्च ग्रहों के उच्चतम स्थानों की जानकारी होने से हम अपने जीवन में उच्चता और संपन्नता को प्राप्त कर सकते हैं।

    यह एक गहरी विषय है और इसका विश्लेषण करना मुश्किल है। लेकिन ज्योतिष विद्या के अनुसार, इसे ठीक से समझने से हमें अपने भविष्य में उपाय और संशोधन करने की संभावना होती है। ग्रहों की ऊँचाई और निम्नता को समझकर हम अपने जीवन की दिशा और उन्नति पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।

    ज्योतिष में उच्च और नीच ग्रहों का अध्ययन शुभ फलों और अनुकूलता की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उच्च ग्रहों का उच्चतम स्थान होने से उनकी शक्ति और प्रभाव बढ़ जाता है, जबकि नीच ग्रहों का मन्दोच्च स्थान होने से उनकी प्रभावशाली गुणवत्ता कम हो जाती है। इस प्रकार, ग्रहों के उच्च-नीच होने से हमारे जीवन को प्रभावित करने वाले विभिन्न क्षेत्रों में अंतर्निहित शक्ति और संभावनाएं होती हैं।

    इस विषय में कई तरह की मताएं हैं और इस पर चर्चा करने से बहुत सारे संदेह और विपर्यय उत्पन्न हो सकते हैं। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि हम विभिन्न संस्थानों और ग्रंथों के माध्यम से सत्य और तथ्य की जांच करें और सही ज्ञान प्राप्त करें। ग्रहों का उच्च-नीच होना हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रभाव डाल सकता है, और इसलिए उनके अध्ययन का महत्वपूर्ण स्थान हमारे ज्योतिष विद्या में है।

    ग्रहों का उच्च-नीच होना

    ग्रहराशिस्वामी उच्चस्थानपरमोच्च अशनीच स्थानपरम नीच अंशमूलत्रिकोण
    सूर्य्य (र)सिंह (5)मेषमेष 10तुलातुला 10सिंह 1-10 अंश
    चन्द्रमाकर्क(4)मेष 10तुलातुला १०२० अंशवृष 4-30 अंश
    मङ्गल(मं)मेष (1), वृश्चिक (8)मकरमकर 28कर्ककर्क 5मेष 1-18 अंश
    बुध (बु)मिथुन(3), कन्या (6)कन्याकन्या 15मीनमीन 15कन्या 16-20 अंश
    वृहस्पतिधन(9),मीन (12)कर्ककर्क 5मकर २८मकर 5 धन 1-13 अंश
    शुक्र (शु)वृष(2),तुला (7)मीनमीन 27कन्याकन्या 27तुला 1-10 अंश
    शनि (श)मकर(10), कुम्भ(11)तुलातुला (20)मीन/मेषमेष(20)कुम्भ 1-2० अंश
    राहु (रा)मेष (1), कन्या (6)वृष,मिथुन  वृश्चिक,धनवृष
    केतु (के)तुला (7)वृश्चिक,धन  वृष,मिथुनकर्क
  • ग्रहों की गणना और व्याख्या

    ग्रहों की गणना और व्याख्या

    पृथ्वी के साथ सात ग्रह हैं – सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि। राहु और केतु ग्रह नहीं हैं, वे केवल छाया ग्रह हैं। यूरोप में निवास करने वाले ज्योतिषी उन दो ग्रहों को मानते हैं, जो आधुनिक विज्ञान और खगोलविज्ञान (Astronomy) के आधार पर भी होते हैं।

    उन ज्योतिषियों ने आधुनिक विज्ञान और अन्य विज्ञानों के विकास पर भी निर्भर करके इन दो ग्रहों के फलाफल को महत्व दिया है। हालांकि, प्राचीन भारतीय ग्रंथों में यूरेनस और नेपच्यून का कोई उल्लेख नहीं है।

    उपरोक्त ग्रहों का प्रभाव रात्रि और दिन के समय पृथ्वी के चारों ओर माना जाता है। शनि सबसे दूरस्थ ग्रह है और इसलिए पृथ्वी की परिक्रमा या बारह राशियों का भ्रमण, शनि के लिए लगभग 10,759 दिन (लगभग 30 वर्ष) लेता है। शनि के पास निकटवर्ती ग्रह बृहस्पति है, जिसे इन दिनों की तारीखों में लगभग 4,332 दिन (लगभग 12 वर्ष) में एक बार भ्रमण करता है।

    बृहस्पति से निकटवर्ती मंगल है, जिसके लिए एक भ्रमण करने में लगभग 687 दिन लगते हैं। मंगल के बाद पृथ्वी आती है, जिसकी परिक्रमा लगभग 365 दिन (एक वर्ष) में होती है। इसके बाद शुक्र है, जो लगभग 225 दिनों में एक भ्रमण करता है। उसके बाद बुध है, जिसे लगभग 88 दिन में एक भ्रमण करते हैं। सबसे निकटवर्ती ग्रह चंद्रमा है, जो पूरी राशिमाला को 27 दिन 8 घंटों में भ्रमण करता है।

    ज्योतिष में उच्च और नीच स्थान

    राशिस्वामी
    5 सिंहसूर्य्य
    4 कर्कचन्द्रमा
    1 मेष मंगल
    8 वृश्चिक
    2 वृषभ शुक्र
    7 तुला
    3 मिथुनबुध
    6 कन्या
    9 धनु बृहस्पति
    12 मीन
    10 मकर शनि
    12 कुम्भ

    सौरमंडल का सफर

    पृथ्वी चलायमान है, जिसे हमारा धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण दोनों मानते हैं। पृथ्वी एक ग्रह है जो अपनी अक्षरेखा के चारों ओर घूमता हुआ सूर्य के चारों ओर चक्कर काटता है।

    इसके परिणामस्वरूप, हमारे लिए सूर्य की प्रतीक्षा में रात्रि और दिन होते हैं। सूर्य तारा है जो स्थिर रूप से अपनी स्थिति बनाए रखता है और पृथ्वी के चारों ओर घूमता हुआ दिखाई देता है। इसलिए, पृथ्वी सूर्य के आस-पास घूमने के कारण चलायमान है।

    चलो, हम एक सरल उदाहरण के माध्यम से इसे समझाते हैं। यह उदाहरण स्कूल के खेल के मैदान पर खेलते बच्चों के लिए है।

    सोचिए आप एक बच्चा हो और खेल के मैदान पर खड़े हो। तुम्हारे आस-पास दूसरे बच्चे भी खड़े हैं। आप खेल मैदान पर एक बैट लेकर खेल रहे हो।

    अब इस उदाहरण में, तुम खुद चलायमान हो, जबकि बैट अचल है। तुम मैदान के चारों ओर घूम रहे हो, जबकि बैट स्थिर है और उसकी स्थिति बदलती नहीं है। इस प्रकार, तुम खुद चल रहे हो, परंतु बैट स्थिर है।

    वैसे ही, पृथ्वी भी खुद चलायमान है और सूर्य अचल है। पृथ्वी अपनी अक्षरेखा के चारों ओर घूमती है, जबकि सूर्य स्थिर रूप से अपनी स्थिति बनाए रखता है। इस तरह, पृथ्वी चलायमान है, जबकि सूर्य अचल है।

  • नक्षत्रों की आकर्षक दुनिया: एक अद्वैत अनुभव

    नक्षत्रों की आकर्षक दुनिया: एक अद्वैत अनुभव

    “नक्षत्र की खोज से खुलेगा आपका पूरा व्यक्तित्व: अपने अंदर छिपी विशेषताओं का आभास करें और बदलें अपना जीवन”

    नक्षत्र क्या है

    तारागण में से ही कतिपय को वृद्धों ने नक्षत्र नाम से पुकारा है। यदि हमें एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़े और उस स्थान तक पहुँचने के लिये सड़क भी हो, तो जब तक उस सड़क का विभाग किसी रीति से, जैसे कोस या मील द्वारा, न किया जाय तब तक यह कहना कि अमुक घटना उस सड़क पर चलते हुए. किस स्थान में हुई थी, बड़ा ही कठिन होगा। इसलिये सड़कों को माइलों में विभक्त करने की प्रणाली है और प्रति माइल को भी चार भागों में बाँटकर ३ इत्यादि चिह्न दे दिया जाता है । इन चिह्नों के द्वारा किसी घटना के स्थान को बड़ी सरलता से बतलाया जा सकता है। जैसे अमुक घटना नव माइल तय करने पर दसवें माइल के चतुर्थांश अथवा अर्द्धांश पर हुई ।

    अतएव महर्षियों ने आकाश मण्डल के तारों को पूर्व-पश्चिम गति से सत्ताईस भागों में विभक्त किया है; तथा प्रति भाग का नाम नक्षत्र रक्खा है। इसलिये यदि आप ध्यान देकर देखेंगे तो यह प्रतीत होगा कि इन सत्ताईस नक्षत्रों की एक माला पृथ्वी के चारों ओर पूर्वापर (पूरब से पश्चिम, उत्तर दक्षिण नहीं) पड़ी हुई है।

    कई तारों के समुदाय को ही नक्षत्र कहते हैं। उन तारों को एक दूसरे से युक्ति- पूर्वक रेखा द्वारा मिला देने से कहीं अश्व, कहीं शिर, कहीं गाड़ी और कहीं सर्पादि का चित्र बन जाता है। इन नक्षत्रादि के नामकरण पर विशेष लिखने की यहाँ आवश्यकता नहीं। तात्पर्य यही है कि इस भूमण्डल के चारों ओर जो तारागण हैं, जिन्हें महर्षियों ने सत्ताईस नक्षत्रों के नाम से पुकारा है,

    उनके द्वारा आकाश-मण्डल में ग्रहों की स्थिति का ठीक-ठीक बोध होता है। जैसे सड़क के पथिक को मील चिह्न से यह कहना सुगम होता है कि अमुक दूरी पर पहुँच गया, उसी तरह गणितज्ञों को यह कहना सरल होगा कि अमुक ग्रह, अमुक समय में, अमुक नक्षत्र में था या है

    नक्षत्रों के विभाग

     प्रत्येक नक्षत्र चार भागों में विभाजित हैं और उनमें हर एक को चरण कहते हैं। इस प्रकार भाग करने से यह हुआ कि ग्रह की स्थिति केवल इतना ही कहकर समाप्त न की जायगी कि अमुक ग्रह अमुक नक्षत्र में था या है बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि वह ग्रह उस नक्षत्र के किस चरण में है ।

    अब प्रश्न यह उठ सकता है कि किस ग्रह की स्थिति किस समय किस नक्षत्र के किस चरण में थी, है या होगी, इसके जानने की विधि क्या है ? यह विषय बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और इस पर सूर्य सिद्धान्त, ग्रहलाघव, आर्यसिद्धान्त आदि बहुत-सी पुस्तकें हैं । पर उन पुस्तकों की सहायता बिना सब बातें किसी शुद्ध पंचांग में भी मिल जाती हैं।

    किसी पंचाङ्ग को यदि आप उठाकर देखेंगे तो आपको यह पता चल जायगा कि अमुक ग्रह अमुक समय में अमुक नक्षत्र के अमुक चरण में है। पंचाङ्ग देखने की रीति जहाँ बतलायी गयी है वहाँ इन बातों को दृष्टान्त देकर पूर्ण रीति से समझा देने का यत्न किया गया है।

    इस स्थान में अब इतना ही लिखना आवश्यक है कि पृथ्वी के चारों ओर तथा पूरब से पश्चिम जाती हुई मालाकार सत्ताईस नक्षत्र हैं। प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण हैं। अतएव मालाकार नक्षत्रों में कुल १०८ (२७x४) चरण हैं ।

    इस सम्बन्ध में एक बात और स्मरण रखने की है कि महर्षियों ने इस मालारूपी तारों (नक्षत्रों) को बारह राशियों में विभक्त किया है। पहिले लिखा जा चुका है कि इस माला में एक सौ आठ चरण हैं। यदि इसकी बारह राशियाँ बनायी जायँ अर्थात् इसको बारह जगहों में बाँटें, तो नौ नौ चरणों की या यों कहें कि २४ सवा दो नक्षत्रों की एक राशि हुई। अब यदि हमको यह मालूम हो कि अमुक ग्रह अमुक समय में अमुक नक्षत्र के अमुक चरण में था, तो इतना जानने के पश्चात् बड़ी सुगमता से यह जाना जा सकता है कि वह ग्रह किस राशि में था !

    नक्षत्र एवं राशियों के नाम

    राशिनक्षत्र(चरण अक्षर)नक्षत्र(चरण अक्षर)नक्षत्र(चरण अक्षर)
    मेषअश्विनी(चू चे चो ला)भरणी(ली लू ले लो)कृत्तिका(अ)
    वृषभकृत्तिका(इ उ ए)रोहिणी(ओ वा वी वु )मृगशिरा(वे बो)
    मिथुनमृगशिरा(का की)आर्द्रा(कु घ ङ. छ)पुनर्वसु(के हो हा)
    कर्कपुनर्वसु(ही)पुष्य(हु हे हो डा)आश्लेषा(डी डु डे डो)
    सिंहमघा(मा मी मू मे)पूर्वा फाल्गुनी(मो टा टी टू)उत्तरा फाल्गुनी(टे)
    कन्याउत्तरा फाल्गुनी(टो पा पी)हस्त(पु ष ण ठ)चित्रा(पे पो)
    तुलाचित्रा(रा री)स्वाती(रु रे रो ता)विशाखा(ती तू ते)
    वृश्चिकविशाखा(तो)अनुराधा(ना नी नू ने)ज्येष्ठा( नो या यि यू)
    धनुमूला(ये यो भा भी)पूर्वाषाढ़ा(भु धा फा ड़ा)उत्तराषाढ़ा(भे)
    मकरउत्तराषाढ़ा(भो जा जी )श्रवणा(खी खू खे खो)धनिष्ठा(गा गी)
    कुम्भधनिष्ठा(गू गे)शतभिषा(गो सा सी सू)पूर्वभाद्र(से सो दा)
    मीनपूर्वभाद्र( दी)उत्तरभाद्र(दू थ झ ञ)रेवती(दे दो चा ची)

     इस विषय को सुगमता से समझने के लिये एक चक्र दिया जाता है जिसके अवलोकन मात्र से पूर्व लिखी हुई बातें हस्तामलक हो जायँगी ।

    नक्षत्रों के प्रत्येक चरण को ज्योतिष शास्त्र में वर्णमाला के एकैक अक्षर से विख्यात किया है। तात्पर्य यह कि प्रति चरण का एक सौ आठ नाम नहीं देकर केवल अक्षरों से ही उनका बोध कराया गया है।

    नक्षत्रों का आरम्भ अश्विनी से होता है । अश्विनी का प्रथम चरण ‘चु’, द्वितीय ‘चे’, तृतीय ‘चो’ और चतुर्थ ‘ला’ । भरणी का प्रथम चरण ‘ली’, द्वितीय ‘लु’, तृतीय ‘ले’ और चतुर्थ ‘लो’ | कृत्तिका का प्रथम चरण ‘अ’, द्वितीय ‘इ’, तृतीय ‘उ’ एवं चतुर्थ ‘ए’ है ।

    इसी प्रकार २७ नक्षत्र के प्रत्येक चरण को वर्णमाला का एक अक्षर अकार इकारादि युक्त दिया गया है।

     देखने से यह बोध होता है कि किस नक्षत्र के किस चरण का कौन अक्षर होता है। ज्योतिष में इसका प्रयोग इस प्रकार होता है। जैसे किसी व्यक्ति का जन्म उत्तरा नक्षत्र के तृतीय चरण में हो तो उसका (राशि) नाम ऐसा रक्खा जाता है जिसका प्रथम अक्षर ‘प’ अथवा ‘पा’ हो । (ह्रस्व दीर्घ में भेद नहीं माना जाता है) ।

    जैसे पद्मराग मिश्र अथवा पार्वतीदेवी इत्यादि । इसी रीति से यदि यह मालूम हो कि अमुक व्यक्ति का राशिनाम नर्मदेश्वर शर्मा है तो चक्र में देखने से तुरत बोध हो जायगा कि उस व्यक्ति का जन्म अनुराधा के प्रथम चरण में है। इसी प्रकार और सब भी जानना होगा।

  • ज्योतिष राशियों के रहस्यमय आकर्षण

    ज्योतिष राशियों के रहस्यमय आकर्षण

    प्रत्येक नक्षत्र को चार चरणों और 13.3 डिग्री अंशों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक नक्षत्र के प्रत्येक चरण को एक अक्षर से भी प्रतिष्ठित किया गया है। जब कोई व्यक्ति जन्म लेता है, तब उसका नाम उसी चरण अक्षर के आधार पर रखा जाता है। उदाहरण के लिए, अगर किसी व्यक्ति का जन्म अश्विनी नक्षत्र के तीसरे चरण में हुआ है , तो उसका नाम आदि अक्षर “चो” से शुरू होगा और उसी के आधार पर चोब सिंह या चौथराम इत्यादि नामांकित होगा।

    जैसे कि पूरे कुंडली को 27 नक्षत्रों में विभाजित किया गया है, उसी तरह 12 राशियों या 108 भागों में भी बांटा गया है, जो 360-डिग्री अंश में भी समान रूप से विभाजित है। इसलिए, 12 राशियाँ मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। भूमंडल के 30-डिग्री या 9 भागों को एक राशि कहा जाता है। हर एक नक्षत्र को चार चरणों में बांटा गया है और प्रत्येक नक्षत्र चार बराबर भागों में विभाजित किया गया है और प्रत्येक भाग को एक संबंधित चरणाक्षर से संबंधित किया गया है। इस प्रकार, 27 नक्षत्रों के कुल 108 भाग यानी चरण हो गए हैं और कुल 12 राशियाँ हैं, जिसमें हर एक राशि में 9 भाग या 9 चरण होते हैं

    मेष राशि:

    • एक चर राशि है जो पुरुषत्व को प्रदर्शित करती है।
    • पूर्व दिशा की स्वामी है।
    • प्रकृति उग्र होती है।
    • इसका स्वामी मंगल होता है।
    • इस राशि में सूर्य उच्च और शनि नीच होते हैं।
    • प्राकृतिक स्वभाव साहसी, अभिमानी, और मित्रों पर कृपा रखने वाला होता है।
    • पहले नवांश तक अपने प्राकृतिक स्वभाव को विशेष रूप से प्रकट करती है।

    वृषभ राशि:

    • यह एक स्त्री राशि है।
    • दक्षिण दिशा का स्वामी होता है।
    • इसका स्वामी शुक्र होता है।
    • इस राशि में चंद्रमा उच्च होता है और राहु एवं केतु नीच होते हैं।
    • प्राकृतिक स्वभाव स्वार्थी, समझबूझ कर काम करने वाला, परिश्रमी और सांसारिक कार्यों में दक्ष होता है।

    मिथुन राशि:

    • यह राशि पुरुषत्व को लिए हुए पश्चिम दिशा को इंगित करती है।
    • इसका स्वामी बुध होता है।
    • नवम अंश तक यह अपने प्राकृतिक स्वभाव को पूर्ण रूप से प्रकट करती है।

    कर्क राशि:

    • यह एक सौम्य राशि है जो स्त्रीत्व और जल तत्व को प्रदर्शित करती है।
    • उत्तर दिशा का स्वामी होती है।
    • कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा होती है।
    • कर्क में मंगल नीच होता है और गुरु उच्च होता है।
    • पहले नवांश तक यह अपने प्राकृतिक स्वभाव को पूर्णतया प्रकट करती है।

    सिंह राशि:

    • यह एक स्थिर राशि है।
    • यह पुरुषत्व को प्रदर्शित करती है।
    • पूर्व दिशा का स्वामी है।
    • यह एक निर्जल राशि है।
    • इसके स्वामी सूर्य हैं।
    • 1 से 20 डिग्री तक सूर्य का मूल त्रिकोण और शेष स्वग्रह कहलाता है।
    • यह पांचवें नवांश में अपने स्वभाव को पूर्ण रूप से दिखलाता है।

    कन्या राशि

    • यह एक द्विस्वभाव और स्त्रीत्व को प्रदर्शित करने वाली राशि है।
    • यह एक निर्जल राशि है।
    • इसके स्वामी बुध हैं।
    • बुध 15 डिग्री तक और शुक्र में नीच हो जाते हैं।
    • 16 डिग्री से 25 डिग्री तक यह मूलत्रिकोण और शेष में स्वग्रही रहते हैं।
    • प्राकृतिक स्वभाव मिथुन के जैसा होता है।
    • यह नवे नवांश तक प्राकृतिक स्वभाव को पूर्ण रूप से प्रकट करता है।

    तुला राशि

    • यह पश्चिम दिशा का स्वामी है।
    • इसके स्वामी शुक्र हैं।
    • इसमें शनि उच्च के और सूर्य नीच के होते हैं।
    • इसमें 20 डिग्री तक शुक्र का मूल त्रिकोण और श्रेष्ठ शुक्र होता है।
    • मित्र राशि केतु होती है।
    • यह पहले नवांश में पूर्ण रीति से अपने स्वभाव को प्रकट करता है।
    • यह एक चर राशि है और पुरुषत्व को प्रदर्शित करती है।

    वृश्चिक राशि

    • यह एक स्थिर और सौम्य राशि है जो स्त्रीत्व को प्रदर्शित करती है।
    • यह उत्तर दिशा का स्वामी है।
    • इसे अर्ध्य जल राशि कहा जाता है।
    • इसके स्वामी मंगल है।
    • इसमें चंद्रमा नीच, केतु उच्च और राहुल नीच होते हैं।
    • पंचम नवांश में यह प्राकृतिक स्वभाव को पूर्ण रूप से प्रकट करती है।

    धनु राशि

    • यह एक द्विस्वभाव और पुरुषत्व को प्रदर्शित करने वाली राशि है।
    • यह अर्ध्य जल राशि है।
    • इसके स्वामी बृहस्पति हैं।
    • इसमें गुरु का मूल त्रिकोण होता है और 20 डिग्री तक शेष स्वक्षेत्र होता है।
    • यह नवे नवांश तक अपने प्राकृतिक स्वभाव को प्रकट करती है।

    मकर राशि

    • यह एक चर और सौम्य राशि है जो स्त्रीत्व को प्रदर्शित करती है।
    • इसके स्वामी शनि हैं।
    • इसमें बृहस्पति नीच होते हैं और मंगल उच्च होते हैं।
    • इसमें केतु मूल त्रिकोण में होते हैं।
    • यह पहले नवांश में प्राकृतिक स्वभाव को दिखाती है।

    कुंभ राशि

    • कुंभ राशि एक स्थिर राशि है जो पुरुषत्व को प्रदर्शित करती है।
    • इसका स्वामी पश्चिम दिशा का होता है।
    • यह अर्ध जल राशि है।
    • इसके स्वामी शनि होते हैं।
    • 20 डिग्री तक इसमें शनि का मूल त्रिकोण और शेष स्वक्षेत्र होता है।
    • पांचवें नवांश तक इस राशि में प्राकृतिक स्वभाव प्रकट होता है।

    मीन राशि

    • यह एक द्विस्वभाव की राशि है जो स्त्रीत्व और जल तत्व को प्रदर्शित करती है।
    • यह पूर्ण रूप से जल राशि है।
    • इसके स्वामी बृहस्पति होते हैं।
    • इसमें बुध नीच और शुक्र उच्च होते हैं।
    • नवम नवांश तक यह अपने स्वभाव को पूर्ण रूप से प्रकट करती है।

    1) मेष, कर्क, तुला और मकर को चार रस्सियों या गतिशील रस्सियों के रूप में जाना जाता है। इनका शासक ब्रह्मा होता है। उनकी प्रकृति आगे बढ़ने और गतिशील होने की होती है।

    (2) वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ को स्थिर रस्सि या स्थिर रस्सि के रूप में जाना जाता है। इनका शासक महादेव शिव होता है। उनकी प्रकृति स्थिर और स्थिर होने की होती है।

    (3) मिथुन, कन्या, धनु और मीन को द्विस्वभावी रस्सि या दोहरी रस्सि के रूप में जाना जाता है। इनका शासक भगवान विष्णु होता है। इनकी प्रकृति कभी-कभी स्थैतिक होती है और कभी-कभी गतिशील होती है।

    (1) सात्त्विक राशियां – कर्क, सिंह, धनु और मीन।

    (2) राजसिक राशियां – मेष, वृषभ, तुला, वृश्चिक।

    (3) तामसिक राशियां – मिथुन, कन्या, मकर, कुंभ।

    राशि दिशानिर्देश दिखाती है –

    (1) मेष, सिंह और धनु पूर्व में दिखाती हैं।

    (2) वृषभ, कन्या और मकर दक्षिण में दिखाती हैं।

    (3) मिथुन, सिंह और कुम्भ पश्चिम में दिखाती हैं।

    (4) कर्क, वृश्चिक और मीन उत्तर में दिखाती हैं।

    राशियों के रंग इस प्रकार होते हैं – मेष लाल रंग दिखाता है। वृषभ सफेद दिखता है। मिथुन हरी घास का हरा रंग दिखाता है। कर्क फीका लाल दिखता है। सिंह सफेद दिखता है। कन्या में विविधता होती है। तुला काली दिखती है। वृश्चिक लाली भूरे रंग को दिखाता

    है। धनु घास के छिलके के रंग को दर्शाता है। मकर विविधता दिखाता है। कुंभ भूरा रंग दिखाता है। मीन मछली के रंग को दर्शाता है।

    राशिविशेषताएं
    मेषसाहसी, स्वतंत्र, प्रथम भाव का स्वामी
    वृषभस्थिर, आर्थिक संपत्ति, मूलांकाधीश
    मिथुनसंचारप्रिय, बुद्धिमान, वाणी का स्वामी
    कर्कआदर्शवादी, परिवार-संबंधी, चंचल
    सिंह
    सौभाग्यशाली, सामंजस्यप्रिय, शुक्र का स्वामी
    कन्याविवेकी, व्यवस्थापक, बुध का स्वामी
    तुलासौभाग्यशाली, सामंजस्यप्रिय, शुक्र का स्वामी
    वृश्चिकगहनता, रहस्यमय, मंगल का स्वामी
    धनुउत्साही, अवांछितता, गुरु का स्वामी
    मकरसंघटित, प्रबंधनशील, शनि का स्वामी
    कुंभविचारशील, मैत्रीप्रिय, शनि का स्वामी
    मीनसंवेदनशील, सहृदय, गुरु का स्वामी