सबसे पहले यह बताते हैं कि किस ग्रह से क्या विचार करना चाहिए – किस वस्तु का कौन-सा ग्रह कारक है। किस भाव से क्या-क्या विचार करना चाहिए,
इससे यह भी सिद्ध होता है कि जो बात भाव से विचार की जावे वह भाव के स्वामी से भी विचार करना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि छठे भाव से शत्रु का विचार किया जाता है तो छठे भाव के स्वामी से भी शत्रु का विचार करना चाहिए।
यह तो भाव का मालिक होने के कारण उस ग्रह में विशेषता आई। परन्तु उसका अपना साधारण गुण क्या है?
मान लीजिए दस आदमियों की कुण्डली में सूर्य अलग-अलग दस भावों का स्वामी है। जिसमें लग्न का स्वामी है उसमें लग्नेश का प्रभाव दिखावेगा, जिसमें धन स्थान का स्वामी है उसमें घनेश का प्रभाव दिखावेगा उचित ही है।

सूर्य
परन्तु सूर्य का अपना स्वाभाविक गुण धर्म क्या है? तांबा, सोना, पिताः, शुभ फल, (अर्थात् अपना शुभ), धैर्य, शौर्य, (पराक्रम) युद्ध में विजय, आत्मा, सुख, प्रताप, राजसेवा, शक्ति, प्रकाश, भगवान शिव सम्बन्धी कार्य, वन (जंगल) या पहाड़ में यात्रा, होम (हवन) कार्य में प्रवृत्ति,
देवस्थान (मन्दिर) तीक्ष्णता, उत्साह आदि का विचार बुद्धिमान् मनुष्य सूर्य से करें। अर्थात् सूर्य उपयुक्त का कारक है।
चंद्रमा
माता का कुशल, चित्त की प्रसन्नता, समुद्र स्नान, सफेद चंवर (या सफेद वस्तु और चंवर), छत्र, सुन्दर पंखे (राज चिह्न फल, पुष्प, मुलायम वस्तु, खेती, अन्न
कीर्ति (यश), मोती, चाँदी, काँसा, दूध, मधुर पदार्थ, वस्त्र, जल, गाय, स्त्री प्राप्ति, सुखपूर्वक भोजन, रूप (सुन्दरता) – इनके संबंध का फलादेश चंद्रमा से कहना चाहिए। चंद्रमा इन सब का कारक है।
मंगल
अब यह बताते हैं कि मंगल से किन-किन वस्तुओं का विचार करें। (शारीरिक और मानसिक ताक़त) पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले पदार्थ, भाई-बहिनों के गुण (भाई-बहिनों का सुख कैसा रहेगा), क्रूरता, रण, साहस, विद्वेष (शत्रुता), रसोई की अग्नि, सोना, ज्ञाति (जाति के लोग–दायाद),
अस्त्र, चोर, शत्रु, उत्साह, दूसरे पुरुष की स्त्री में रति, मिथ्या भाषण, वीर्य (ताकत, पराक्रम), चित्त की समुन्नति (चित्त का उत्साह, उदारता; बहादुरी या ऊंचापन), कालुष्य (पाप या बुरा काम), व्रण (घाव), चोट, सेनाधिपत्य आदि का विचार मंगल से करें।
बुध
बुध किन बातों पर विशेष प्रभाव डालता है या यूँ कहें कि बुध किन वस्तुओं का विशेष अधिष्ठाता है? पाण्डित्य, अच्छी वाक् शक्ति (बोलने की शक्ति), कला, निपुणता, विद्वानों द्वारा स्तुति, मामा, वाक्-चातुर्य, उपासना आदि में पटुता (चतुरता), विद्या में बुद्धि का योग, बुद्धि
(बुद्धिमान होना अलग बात है और विद्या में बुद्धि लगाये रहना), पृथक् बात है यज्ञ, भगवान विष्णु सम्बन्धी धार्मिक कार्य, सत्य वचन, सीप, विहार स्थल (आमोद-प्रमोद की जगह), शिल्प (तथा शिल्प कार्य में चतुरता), बन्धु, युवराज, मित्र, भानजा, भानजी आदि का विचार बुध से करें।

बृहस्पति
अब बृहस्पति किन-किन का कारक है:: ज्ञान: अच्छे गुण, पुत्र, मंत्री, अच्छा आचार (आचरण), या अपना आचरण (चरित्र, कार्य), आचार्यत्व (पढ़ाना या दीक्षा देना) माहात्म्य (आत्मा का महान् होना), श्रुति (वेद) शास्त्र, स्मृति आदि का ज्ञान,
सब की उन्नति, सद्गति, देवताओं और ब्राह्मणों की भक्ति, यज्ञ, तपस्या, श्रद्धा, खजाना, विद्वत्ता, जितेन्द्रियता, सम्मान, दया आदि का विचार बृहस्पति से करें। विशेष यह है कि यदि स्त्री की जन्मकुण्डली का विचार करना हो तो पति सुख का विचार भी बृहस्पति से करना चाहिए।
शुक्र
सम्पत्ति, सवारी, वस्त्र, भूषण, निवेश में रखे हुए द्रव्य, तौयंत्रिक (नाचने, गाने तथा बाजे का योग), सुगन्धि, पुष्प, रति (स्त्री, पुरुष प्रसंग), शय्या (पलंग) और उससे संबंधित व्यापार, मकान, धनिक होना, अर्थात् वैभव, कविता का सुख, विलास, मंत्रित्व (मिनिस्टर होना), सरस उक्ति, विवाह या अन्य शुभ कर्म, उत्सव आदि का विचार शुक्र से करें।
शनि
आयु, मरण, भय, पतन (किसी ऊँचे स्थान से गिरना या सम्मान छूटना, जातिच्युति आदि होना), अपमान, बीमारी, दुःख, दरिद्रता, बदनामी, पाप, मजदूरी, अपवित्रता, निन्दा, आपत्ति, कलुषता (मन का साफ न होना, निन्दा, निन्दित कर्म आदि),
आपत्ति, मरने का सूतक, स्थिरता, नीच व्यक्तियों का आश्रय, भैंस, तन्द्रा (आलस्य, ऊँघना), लोहे की वस्तु, नौकरी, दासता, जेल जाना, गिरफ्तार होना, खेती के साधन आदि का विचार शनि से करें।















