मंगल ग्रह का 2023 के 1 जुलाई से कर्क राशि से सिंह राशि में गोचर महत्वपूर्ण है। इस लेख में, हम विभिन्न राशियों पर मंगल के गोचर के प्रभाव के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।
यह ज्ञानवर्धक और मार्गदर्शक लेख आपको राशिफल में मंगल के गोचर के महत्वपूर्ण पहलुओं की समझ में मदद करेगा।
मिथुन राशि:
मंगल के गोचर का प्रभाव: मंगल मिथुन राशि के तीसरे और छठे भाव पर प्रभाव डालेगा। इस अवधि में मिथुन राशि के जातकों को साहस और वीरता में वृद्धि महसूस होगी और वस्त्रों से संबंधित कारोबार में लाभ होगा। वे अपने प्रतिद्वंद्वियों से असंघटित होंगे और सफलता प्राप्त करेंगे।
पिता का समर्थन: मंगल के गोचर के दौरान 17 अगस्त तक, मिथुन राशि के जातकों को अपने पिता का समर्थन प्राप्त होगा। यह उन्हें अपूर्ण कार्यों को पूरा करने में सहायता करेगा और सरकारी कर्मचारियों को अधिकारियों की सहायता और मान्यता प्राप्त होगी।
धनु राशि:
मंगल धनु राशि के जातकों के लिए पंचम और बारहवें घर का स्वामी होता है। 1 जुलाई को, मंगल धनु राशि के नवम घर में गोचर करेगा, जो भाग्य को प्रतिष्ठित करता है।
इस परिवर्तन के कारण, धनु राशि वाले धार्मिक यात्राओं पर निकलेंगे और अपने मार्गदर्शकों से सहायता प्राप्त करेंगे। इस अवधि के दौरान अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वाणिज्य से जुड़े लोग बहुत लाभान्वित होंगे।
यदि आपके पास विदेश में शिक्षा करने की योजना है, तो यह आपके लिए एक अनुकूल समय है। इसके अलावा, पूर्वजों की संपत्ति से संबंधित किसी चल रहे विवाद को शांतिपूर्वक सुलझा सकते हैं। वाहनों या संपत्तियों में निवेश करने के लिए भी यह एक अच्छा समय है। इसके साथ ही, इस अवधि में आपके घर में मधुर समारोह हो सकते हैं।
मीन राशि:
मीन राशि के जातकों के लिए मंगल द्वितीय और नवम घर के स्वामी के रूप में कार्य करता है। 1 जुलाई को, मंगल मीन राशि के छठे घर में गोचर करेगा, जो प्रतिद्वंद्वियों को प्रतिष्ठित करता है।
मंगल का यह गोचर बहुत ही अनुकूल परिणाम लाता है। करियर में आगे की प्रगति की उम्मीद हो सकती है, संभावित पदोन्नति और प्रतिद्वंद्वियों पर विजय। मंगल का नवम घर में होना दर्शाता है कि भाग्य आपके साथ है।
इस अवधि में विदेश यात्रा के अवसर आपके सामने प्रस्तुत हो सकते हैं।भविष्य संबंधी यात्राओं की आवश्यकता हो सकती है, जो भविष्य में लाभदायक साबित होगी।
लग्न पर मंगल का प्रभाव आपका आत्मविश्वास बढ़ाएगा और आपकी साहस, वीरता और महिमा में वृद्धि होगी, जिससे समाज में मान्यता और सम्मान प्राप्त होगा। आप की अगुआई में सफलता हासिल होगी, जो एक नेता की तरह होगी।
2023 के 1 जुलाई से 17 अगस्त तक मंगल के गोचर में मिथुन, धनु और मीन राशि के जातकों के लिए समृद्धि और प्रगति की महत्वपूर्ण संभावनाएं हैं।
यह आकाशीय घटना जीवन के विभिन्न पहलुओं में, संघर्षों को पार करने में, करियर, शिक्षा, यात्रा, संपत्ति और प्रतिद्वंद्वियों को परास्त करने में अवसर लाती है। इस शुभ समय को आप स्वीकार करें और ग्रहों द्वारा आप पर प्रसन्न ऊर्जाओं का उपयोग करें।
1 जुलाई’23 से होने वाला मंगल का यह गोचर वृषभ, कन्या और मकर राशि के जातकों के लिए उतना अनुकूल नहीं रहेगा।
वृषभ राशि:
वृषभ राशि के जातकों के लिए मंगल द्वादश और सप्तम भाव के स्वामी होते हैं
मंगल अपने गोचर के दौरान वृषभ राशि के चौथे भाव में होगा।
इस दौरान आपको धन संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
कार्यस्थल पर साजिशों के खिलाफ सतर्क रहने की आवश्यकता होगी।
वैवाहिक जीवन में थोड़ा तनाव या अस्थिरता दिखाई दे सकती है।
साझेदारी में कोई नया काम शुरू करने से बचें।
स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
कन्या राशि:
कन्या राशि के जातकों के लिए मंगल तीसरे और अष्टम भाव के स्वामी होते हैं और अब मंगल का गोचर आपके द्वादश भाव, अर्थात् व्यय भाव में होगा। इस भाव में स्थित मंगल की पूर्ण दृष्टि तीसरे, छठे और सप्तम भाव पर होगी।
इस भाव में मंगल के होने से आपको व्यर्थ यात्राएं करनी पड़ सकती हैं और इस समय आपके आर्थिक रूप से थोड़े कमजोर होने के भी संकेत दिखाई पड़ रहे हैं।
आपको मनचाहे प्रमोशन की प्राप्ति में कुछ दिक्कतें आ सकती हैं। आपको अपने बॉस के साथ मिठासपूर्वक संबंध बनाए रखने होंगे। वर्तमान नौकरी को बदलने से बचना चाहिए, क्योंकि यह प्रगति के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता है।
इस समय अत्यधिक उत्साह में आकर ऐसा कोई भी काम ना करें जो भविष्य में आपको दिक्कत दे। इस समय भाई-बहनों के साथ थोड़ा तनाव भी संभव है। आपको इस समय सलाह दी जाती है कि आप अपनी पत्नी की सेहत का ख्याल रखें।
मकर राशि:
मकर राशि वालों के लिए मंगल चौथे और एकादश भाव के स्वामी होते हैं और अब मंगल का गोचर आपके अष्टम भाव, यानी आकस्मिक घटनाओं के भाव में होगा। इस भाव में स्थित मंगल की पूर्ण दृष्टि आपके एकादश, धन और तीसरे भावों पर होगी। इस भाव में मंगल के गोचर के कारण आपको कोई चोट लग सकती है।
इस समय आपको सलाह दी जाती है कि आप अपने वाहन को सावधानी से चलाएं। व्यापारियों के लिए यह समय अनुकूल नहीं हो सकता है। आपको अपने व्यापार में धन की कमी से जूझना पड़ सकता है। इस समय पारिवारिक विवाद भी उभर सकते हैं।
आपको अपनी वाणी को संयमित रूप से प्रयोग करना होगा, ताकि आपके कठोर शब्दों के कारण किसी के साथ कलह न हो जाए। इस समय आपके साहस और पराक्रम में थोड़ी कमी दिख सकती है। आपको आर्थिक लेन-देन में भी सावधानी बरतनी होगी।
Disclaimer:
मंगल के गोचर का महत्व ज्योतिषीय दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह लेख आपको विभिन्न राशियों पर मंगल के गोचर के प्रभाव की संभावित प्रक्रिया समझाने का प्रयास करता है। कृपया ध्यान दें कि ज्योतिष विज्ञान के प्रतिष्ठित विद्वानों से परामर्श लेना सुरक्षित और उचित होगा।
– यन्त्र और मन्त्र में रुचि बढ़ती है और राजाओं से मित्रता होती है।
– भाई बन्धुओं के साथ शत्रुता हो सकती है, स्त्री, पुत्र और पिता से वियोग या चिंता हो सकती है।
– राजा, चोर, शत्रु से भय हो सकता है, और दांत, नेत्र, और उदर में पीड़ा, गोधन और नौकरों में कठिनाई हो सकती है।
– उच्च नीच और अन्य ग्रहों से युत रहने से फल में परिवर्तन हो सकता है।
### विशेषफल
1. मेष राशि में उच्च सूर्य की दशा: धर्म-कर्म में प्रीति होती है, पिता का संचय किया हुआ धन और भूमि का लाभ होता है। सुख, साहस, यश, राज्य, मान, सुसंगति, भ्रमण, शीलता और विजय प्राप्त होती है।
2. उच्च सूर्य की दशा: धन, अन्न और पशुओं की वृद्धि होती है। परदेश वास और भ्रमण हो सकता है। धन प्राप्ति, रति-विलास और गीता आदि में प्रेम होता है। घोड़े और रथादि का सुख भी मिलता है।
3. आरोही सूर्य की दशा: आनंद, इज्जत और दानशीलता होती है। सुख मिलता है वन्धुवर्गों, पृथ्वी, गौ, घोड़े, हाथी और कृषि से।
4. अवरोही सूर्य की दशा: शरीर में रोग, कष्ट, मित्रों से विरोध, चतुष्पद, गृह कृषि और द्रव्य की हानि होती है। राजा से कोप, चोर, अग्नि, झगड़ा और परदेश वास हो सकता है।
5. परम नीच सूर्य की दशा: माता-पिता की मृत्यु, स्त्री-पुत्र, पशु, पृथ्वी और गृह में हानि होती है। परदेश वास, भय और मृत्यु की आशंका हो सकती है।
6. नीच सूर्य की दशा: राज-कोप से धन और मान की हानि होती है। स्त्री, पुत्र, मित्रों से क्लेश होता है और किसी स्वजन की मृत्यु हो सकती है।
7.जब सूर्य मूल त्रिकोण में रहता है, तो उसकी महादशा में वाहन आदि से सुख मिलता है और पद, स्त्री-पुत्र, परिवार, धन, पशु और मान की प्राप्ति होती है।
8.स्वगृही रवि की महादशा में विद्या की प्राप्ति होती है, वियोति के साथ अच्छा संबंध बनता है और एकता मिलती है। 9.अति मित्र गृही के दौरान व्यक्ति को भूख, आनंद, स्त्री-पुत्र और अन्य सुख मिलते हैं। जातक को वस्त्र और वाहनों का सुख मिलता है और कुंआ, तालाब आदि का भाग्य भी प्राप्त होता है।
(१०) मित्र-गृही सूर्य की दशा में जातक को अपनी जाति के द्वारा सम्मान, पुत्र, मित्र और राज से सुख प्राप्त होता है। अपने बंधुओं के साथ प्रेम बढ़ता है, पृथ्वी की प्राप्ति होती है, और वस्त्र, भूषण और वियोति से भी सुख मिलता है।
(११) समग्रही सूर्य की दशा में जातक को कृषि, पृथ्वी और पशु आदि से सुख मिलता है। कन्या संतान की प्राप्ति का सौभाग्य होता है और अपने जनों के साथ समझभेद नहीं होता, लेकिन ऋण से दुखी रहता है।
(१२) शत्रुगृही सूर्य की दशा में जातक को संतान, धन और भाग्य की हानि होती है। स्त्री के साथ विवाद संभव होता है और राजा, अग्नि और चोरी के मामलों में भय होता है।
(१३) जब रवि अतिशत्रुगृही होता है, तो उसकी दशा में स्त्री, पुत्र और संपत्ति की हानि होती है। पुत्र, मित्र और पशुओं से क्लेश होता है और अपनी जाति के सदस्यों के साथ मतभेद होता है।
(१४) उच्चनवांश में जब रवि रहता है, तो उसकी दशा में जातक को साहस, धन की वृद्धि और विभिन्न तरीकों से सुख प्राप्त होता है। स्त्री के साथ संभोग और स्त्री-धन से लाभ भी होता है, लेकिन पितृ-कुल के जनों में बार-बार क्षति होती है।
(१५) यदि सूर्य नीचनवांश में होता है, तो उसकी दशा में परदेश यात्रा में स्त्री, पुत्र, धन और पृथ्वी की हानि होती है। ऐसी दशा में जातक मानसिक व्यथा से पीड़ित और ज्वर से प्रभावित होता है, और गुप्त इंद्रियों की वेदना से दुखी रहता है।
(१६) उच्चस्थ सूर्य अगर नीच नवमांश का हो, तो उसकी दशा में स्त्री की मृत्यु, जातक के पासी कुटुम्बियों को भय और मृत्यु, और संतान को समस्या होती है।
(१७) नीचस्थ सूर्य यदि उच्च नवमांश में हो तो उसकी दशा के आदि में महान् सुख और उच्च मान की प्राप्ति होती है। पर, दशा के अन्त में विपरीत फल होता है।
(१८) पाप षष्ठांश में यदि सूर्य रहता है तो उसकी दशा में पिता और पितृ-पक्ष के लोगों को क्लेश और मृत्यु का भय होता है। राजा के कोप से जातक को भय, दुःख तथा देश निकाला भी सम्भव होता है। जातक स्वभाव का चिड़चिड़ा एवं शिर की बेदना से व्यथित होता है।
(१९) पारवतांश इत्यादि में यदि सूर्य हो तो उसकी दशा में जातक को स्रोत, संतान, मित्र और कुटुंब का सुख, राजा से अनुग्रहीत, धन तथा मान प्राप्त होता है।
(२०) सर्प पाश और ई काम का यदि सूर्य हो तो उसकी दशा में सर्प, विष, अग्नि और जलाशय आदि से जातक को भय तथा अनेकानेक प्रकार के शोक एवं दुःख का भोगन होता है।
(२१) यदि सूर्य उच्च ग्रह के साथ बैठा हो, तो उसकी दशा में जातक को वीर्यादि के प्रवाह, विष्णु पूजा, पवित्र नदियों में स्नान, देवालयों के दर्शन का सुख, कूप, तड़ागा और घरों के निर्माण का सौभाग्य मिलता है। इसके साथ ही धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन और धार्मिक विषयों की प्राप्ति भी होती है। (
२२) यदि सूर्य पापग्रह के साथ हो, तो उसकी दशा में जातक को घटिया भोजन, पुरानी वस्तुओं की प्राप्ति, निकृष्ट प्रकार की जीविका और अनिष्ट क्रियाओं के द्वारा दुःख का अनुभव होता है, जिससे उसके शरीर कमजोर होते हैं।
(२३) यदि सूर्य शुभग्रह के साथ हो, तो उसकी दशा में जातक को धन की प्राप्ति पृथ्वी से, वस्त्र और अन्य वस्त्रों का लाभ, मित्रों के साथ आनंद, परिवार के सदस्यों से प्रेम और विवाहादि के उत्सव का आनंद मिलता है।
(२४) यदि शुभ दृष्टि वाले रवि की दशा में हो, तो जातक को विद्या से प्राप्त होने वाली प्रसिद्धि, पुत्र, स्त्री और अन्य स्त्री वर्गों से आनंद और सुख मिलता है, और इससे उसके माता-पिता को आनंद और उसे राजस्थान में सम्मान प्राप्त होता है।
(२५) अशुभ दृष्टि वाले रवि की दशा में जातक को विभिन्न प्रकार के दुःख, माता-पिता को भय, स्त्री-पुत्र को दुःख, चोरी, अग्नि और राजदण्ड (जुर्माना) का भय होता है।
(२६) यदि सूर्य को स्थानबल हो, तो उसकी दशा में जातक को खेती से लाभ, पृथ्वी, गौवंश, वाहन, वस्त्र, राजस्थान, सम्मान, दूसरों से धन की प्राप्ति, मित्रों और परिवार से मिलन, और उच्च रूप से सफलता मिलती है। जातक की शारीरिक कांति बढ़ती है, और उसे तीर्थ यात्रा और यज्ञ करने का अवसर मिलता है।
(२७) यदि सूर्य स्थानबल रहित हो, तो उसकी दशा में धन की हानि, भ्रमण, परिवार से घृणा, शारीरिक कमजोरी और दुःख का अनुभव होता है।
(२८) यदि सूर्य दिग्बली हो, तो उसकी दशा में जातक को सभी दिशाओं से धन का आगमन, यश और कीर्ति मिलती
है। उसे भूषण और पृथ्वी से सुख प्राप्त होता है। हालांकि, यदि सूर्य दिग्बल रहित हो, तो उपर्युक्त शुभ परिणाम नहीं होते हैं।
(२९) यदि सूर्य को कालबल हो, तो उसकी दशा में जातक को राजस्थान, सम्मान, खेती और भूमि से लाभ और धन की प्राप्ति होती है। यदि सूर्य कालबल रहित हो, तो उपर्युक्त परिणाम नहीं होते हैं।
(३०) यदि सूर्य को प्राकृतिक बल हो, तो उसकी दशा में जातक को अनियमित रूप से अनेक प्रकार की सुख-सम्पत्ति, पृथ्वी, आभूषण और वस्त्र की प्राप्ति होती है। हालांकि, प्राकृतिक बल रहित सूर्य की दशा में उपर्युक्त परिणाम नहीं होते हैं।
(३१) यदि सूर्य को चेष्टाबल हो, तो उसकी दशा में जातक को कठिनाईयों के बावजूद धन, आनंद, ख्याति, राजस्थान, सम्मान, स्त्री, पुत्र, भोजन, वाहन और खेती का सुख मिलता है। हालांकि, चेष्टाबल रहित सूर्य की दशा में हानि होती है।
(३२) लग्न में यदि रवि हो, तो उसकी दशा में नेत्र रोग, धन हानि और राज-कोप संभव होता है।
(३३) द्वितीय स्थान में यदि रवि हो, तो उसकी दशा में संतानोत्पत्ति के उपरान्त शोक और भय, कुटुम्ब से सन्ताप तथा झगड़ा इत्यादि, स्त्री और धन की हानि, राजा से भय, पुत्र, पृथ्वी तथा वाहनादि का नाश होता है। परन्तु यदि उसके साथ कोई शुभग्रह हो, तो उपर्युक्त अनिष्ट फलों का अभाव होता है।
(३४) तृतीय स्थान में रवि की दशा में, राज-सम्मान, धन-प्राप्ति, आनंद और पराक्रम में उन्नति होती है।
(३५) चतुर्थ स्थान में यदि रवि हो, तो उसकी दशा में स्त्री, संतान, मित्र, पृथ्वी, मकान और वाहनादि को तथा विष, अग्नि, चोर, एवं शस्त्र से जातक को भय होता है।
(३६) पञ्चम तथा नवम स्थान में रवि के रहने से उसकी दशा में जातक का चित्त विक्षिप्त अथवा अव्यवस्थित तथा आनंद रहित होता है। पिता की मृत्यु, राज से अप्रतिष्ठा,
और धार्मिक कर्मों से विमुख होता है।
(३७) षष्ठ स्थान में रवि रहने से उसकी दशा में धन की हानि और दुख होता हैं तथा गुल्म, क्षय, मूत्र कृच्छ्र और जननेन्द्रिय जनित रोग होते हैं।
(३८) सप्तम स्थान में रवि होने से उसकी दशा में स्त्री को रोग अथवा मृत्यु होती है। दूध, घी इत्यादि भोजन के लालित्य पदार्थों का अभाव और भोजन में अनेक असुविधाएं प्रतीत होती हैं।
(३९) अष्टम स्थान में रवि रहने से परदेश गमन, शारीरिक असुख, ज्वर, नेत्र-रोग और संग्रहणी का भय होता है।
(४०) दशम स्थान में रवि रहने से राज-सम्मान, राज-अधिकार और राजा से प्रेम होता है। धन की प्राप्ति और कार्यों में सफलता होती है।
(४१) एकादश स्थान में रवि रहने से धन की प्राप्ति, पद-प्राप्ति, शारीरिक सुख और उत्तम कार्यों में अभिरुचि होती है। तथा स्त्री, पुत्रादि, भूषण-वस्त्र एवं वाहनादि का सुख होता है।
(४२) द्वादश स्थान में रवि रहने से देशाटन, धन, पुत्र, माता-पिता, पृथ्वी आदि की क्षति, विष तथा झगड़े इत्यादि से भय, वाहनादि का विनाश एवं पैरों में रोग होता है।
(४३) मेष राशि में स्थित सूर्य के दौरान, व्यक्ति को धर्म और कर्म में प्रेम, पिता से संग्रहित धन और भूमि का लाभ प्राप्त होता है, और स्त्री, पुत्र और अन्य सुखों का आनंद मिलता है। यदि सूर्य उच्चस्थ हो, तो रोग होता है और अगर अष्टम भाव में हो, तो व्रण रोग होता है और माता-पिता के लिए क्लेशदायक होता है।
(४४) वृष राशि में स्थित सूर्य के दौरान, व्यक्ति को स्त्री, पुत्र और वाहनों का नुकसान होता है, औषधि के द्वारा हृदय रोग से पीड़ित होता है, और मुख और आंखों में भी दुख प्राप्त होता है।
(४५) मिथुन राशि में स्थित सूर्य के दौरान, जातक को मन्त्र, विद्या और शास्त्र में अधिकार प्राप्त होता है। उसे काव्य में रुचि, पुराणों की श्रवण में प्रेम, कृषि से लाभ और विभिन्न प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।
(४६) कर्क राशि में स्थित सूर्य के दौरान, व्यक्ति को कीर्ति का विकास और राजा के प्रेम का अनुभव होता है, परन्तु वह स्त्री के अधीन रहता है। उसे क्रोध ज्वाला बार-बार उभरती है और उसके मित्रों को पीड़ा होती है।
(४७) सिंह राशि में स्थित सूर्य के दौरान, व्यक्ति को खेती और जंगलों आदि से विभिन्न तरीकों से धन की प्राप्ति होती है और उसकी कीर्ति बढ़ती है, और जातक को राजद्वारा सम्मान प्राप्त होता है।
(४८) कन्या राशि में स्थित सूर्य के दौरान, व्यक्ति को कन्या-उत्पत्ति और मर्यादा की प्राप्ति होती है। उसे गुरुजन और देवताओं के प्रति प्रेम होता है और पशुओं का लाभ होता है।
(४९) तुला राशि में स्थित सूर्य के दौरान, व्यक्ति को धन और स्थान की हानि, स्त्री, पुत्र और अन्यों को पीड़ा, चोरी और अग्नि से भय, विदेश यात्रा और नीच कर्म की प्रवृत्ति होती है। परन्तु, यदि सूर्य तुला में बढ़ गया हो, तो उसके दौरान सुख से धन की प्राप्ति, दूसरों को ठगने में सक्षम होना, स्त्री के हेतु दुखी होना और नीच लोगों के साथ मित्रता होती है।
(५०) यदि वृश्चिक राशि में सूर्य हो, तो उसकी दशा में जातक को माता-पिता के साथ मतभेद और कलह, विष, अग्नि और शस्त्र से पीड़ा होती है।
(५१) यदि धन राशि में सूर्य हो, तो जातक को संगीत विद्या से प्रेम होता है। वह स्त्री, पुत्र और धन से सुखी होता है और राजा और गुरुजनों से मान्यता प्राप्त करता है।
(५२) यदि मकर राशि में सूर्य हो, तो उसकी दशा में जातक को स्त्री, पुत्र और धन में कम सुख, रोग से पीड़ित होने और पराधीनता के कारण चिंतित रहना पड़ता है।
(५३) कुंभ राशि में स्थित सूर्य के कारण जातक के लिए चिंता का कारण बनता है। उसकी दशा में स्त्री, पुत्र, और धन के लिए भी परेशानी रहती है। इसके साथ ही उसे अपने शत्रुओं का सामना करना पड़ता है और उसे हृदय रोग से भी पीड़ा होती है।
(५४) मीन राशि में स्थित सूर्य की दशा में जातक को स्त्री, धन, और सुख की वृद्धि होती है। इससे वह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। हालांकि, उसे व्यर्थ यात्राएं करनी पड़ती हैं और उसके पुत्र-पोत्रों को ज्वर और पोड़ा जैसी बीमारियाँ होती हैं।
टिप्पणी: सूर्य की दशा के आदि में माता-पिता को रोग, दुःख, और मान-सम्मान की व्यथा सहनी पड़ती है। दशा के मध्य में पशुओं को हानि पहुंचती है और मनुष्यों को भी पीड़ा होती है। दशा के अंत में विद्या से जनित उन्नति और सुख की प्राप्ति होती है।
प्रति दशा में इन 9 दशाओं की अन्तरदशा होती है। जैसे, मंगल की महादशा में पहली अन्तरदशा मंगल की, दूसरी राहु की, तीसरी बृहस्पति की, चौथी शनि की, पांचवीं बुध की, छठी केतु की, सातवीं शुक्र की, आठवीं सूर्य की और नवीं चंद्र की अन्तरदशा होने पर मंगल की महादशा समाप्त होती है।
इसी प्रकार केतु की महादशा में पहली अन्तरदशा केतु की, दूसरी शुक्र की, तीसरी सूर्य की, चौथी चंद्रमा की, पांचवीं मंगल की, छठी राहु की, सातवीं बृहस्पति की, आठवीं शनि की और नवीं बुध की अन्तरदशा होती है।
इसी तरह और सभी महादशाओं की अन्तरदशा जानना चाहिए। याद रखने की बात यही है कि जिसकी महादशा होती है उसी की पहली अन्तरदशा भी होती है और इसके बाद महादशा के क्रमानुसार अन्तरदशा का क्रम होता है।
120 वर्ष की परमायु में प्रत्येक ग्रह का दशामान होता है। उसी रीति से प्रति ग्रह के दशामान में उसकी अन्तरदशा के ग्रहों का भी मान होता है। जैसे, 120 वर्ष में सूर्य का भाग 6 वर्ष है तो सूर्य की महादशा में सूर्य की अन्तरदशा मान त्रिकोणात्मक से निकाल लिया जाएगा।
परंतु बिना त्रिकोणात्मक के अन्तरदशा निकालने की रीति इस प्रकार है।
जैसे, यदि सूर्य की महादशा में सूर्य की अन्तरदशा जाननी है तो सूर्य के दशा-वर्ष को सूर्य के ही दशा-वर्ष से गुणा कर दिया जाए। जैसे 6 × 6 = 36।
इस 36 में इकाई के स्थान को छोड़कर शेष 3 रहा, वह मास हुआ और इकाई के स्थान में जो 6 है उसको 3 से गुणा करने से 18 दिन हुए। तात्पर्य यह है कि 3 मास 18 दिन सूर्य की महादशा में सूर्य की अन्तरदशा हुई।
यही फल त्रिकोणात्मक करने से भी आएगा। पुनः मालूम करना है कि सूर्य की महादशा में चंद्रमा की अन्तरदशा कितनी होगी तो इसकी बनाने की विधि यह है।
सूर्य की महादशा के वर्ष को चंद्र के महादशावर्ष से गुणा कर दिया तो 6 × 10 = 60 हुआ। एकाई की जगह शून्य है, इस कारण 6 मास उत्तर आया।
फलतः सूर्य की महादशा में चंद्रमा की अन्तरदशा 6 मास तक रहती है।
पुनः यदि यह जानना हो कि सूर्य की महादशा में मंगल की अन्तरदशा कितनी होगी तो सूर्य के 6 अंक को मंगल के 7 से गुणा करने पर 42 हुआ। एकाई के स्थान को 3 से गुणा किया तो 6 हुआ।
अतः 4 महीना 6 दिन मंगल की अन्तरदशा सूर्य की महादशा में हुई।
इसी रीति से सूर्य की महादशा में राहु कीअन्तरदशा निकाली जाएगी।
सूर्य का वर्ष 6, राहु का वर्ष 18(18*6=108), एकाई की जगह 8 को 3 से गुणा किया तो 24 हुआ। उत्तर 10 महीना 24 दिन निकला।
सूर्य की महादशा बृहस्पति की अन्तरदशा इस प्रकार है। सूर्य का वर्ष 6, बृहस्पति का वर्ष 16(16*6=96, एकाई अंक 6 को 3 से गुणा किया तो 18 हुआ। अतः 9 मास(Month) 18 दिन बृहस्पति की अन्तरदशा निकली।
राहु की महादशा में राहु का अन्तरदशा इस तरह से होगा:
राहु का अंक 18 है।(18*18=324) (क्योंकि राहु ही का अन्तर जानना है), एकाई के अंक 4 को 3 से गुणा किया तो 12 आया। अतएव 32 महीना 12 दिन अर्थात् 2 वर्ष 8 महीना 12 दिन हुआ।
इसी प्रकार राहु की महादशा में बृहस्पति की अन्तरदशा इस प्रकार निकाली जाएगी:
राहु का 18 x (बृहस्पति का) 16 = 288। एकाई वाले अंक 8 को 3 से गुणा करने पर 24 हुआ। अतः 28 महीना 24 दिन
अर्थात् 2 वर्ष ४ महीना 24 दिन उत्तर आया।
नियम केवल यही है कि महादशा के वर्ष को अंतरदशा वाले ग्रह के महादशावर्ष से गुणा करने पर जो उत्तर आवे, उसके एकाई स्थान के अंक को 3 से गुणा करने पर दिन निकल आएगा और एकाई स्थान को छोड़कर जो शेष अंक रहेगा वह मास होगा।
यह रीति इतनी सुगम है कि बिना चक्रादि के सहारे अन्तरदशा बनाई जा सकती है
ज्योतिष विज्ञान एक विज्ञान है जो हमारे जीवन को ग्रहों के चाल के माध्यम से प्रभावित करने की कोशिश करता है। एक कुंडली में 12 भावों के द्वारा हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया जाता है। इस लेख में हम आपको इन 12 भावों के बारे में बताएंगे और उनका धन और संपत्ति पर क्या प्रभाव होता है।
भाव संख्या 1:स्वास्थ्य व्यापार
भाव संख्या 2:आर्थिक स्थिति
भाव संख्या 3: भ्रातृ सुख और यात्रा
भाव संख्या 4: घर, वाहन, मातृ सुख
भाव संख्या 5: शिक्षा और संतान
भाव संख्या 6: मुकदमा और रोग
भाव संख्या 7:दाम्पत्य संतान
भाव संख्या 8: आयु
भाव संख्या 9: धन और भाग्य
भाव संख्या 10: पितृ सुख और राजयोग
भाव संख्या 11: आय
भाव संख्या 12: व्यय
1. स्वास्थ्य व्यापार: भाव संख्या 1
– स्वास्थ्य और व्यापार में ग्रहों का प्रभाव।
– ग्रहों के अनुसार उपाय और सुझाव।
2. आर्थिक स्थिति: भाव संख्या 2
– आर्थिक स्थिति पर ग्रहों का प्रभाव।
– आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए उपाय और सुझाव।
3. भ्रातृ सुख और यात्रा: भाव संख्या 3
– भ्रातृ सुख और यात्रा में ग्रहों का प्रभाव।
– भ्रातृ सुख और यात्रा को बढ़ाने के लिए उपाय और सुझाव।
4. घर, वाहन, मातृ सुख: भाव संख्या 4
– घर, वाहन, मातृ सुख पर ग्रहों का प्रभाव।
– घर, वाहन, मातृ सुख को बढ़ाने के लिए उपाय और सुझाव।
5. शिक्षा और संतान: भाव संख्या 5
– शिक्षा और संतान पर ग्रहों का प्रभाव।
– शिक्षा और संतान को बढ़ाने के लिए उपाय और सुझाव।
6. मुकदमा और रोग: भाव संख्या 6
– मुकदमा और रोग पर ग्रहों का प्रभाव।
– मुकदमा और रोग से बचने के लिए उपाय और सुझाव।
7. दाम्पत्य संतान: भाव संख्या 7
– दाम्पत्य संतान पर ग्रहों का प्रभाव।
दाम्पत्य संतान पर ग्रहों का प्रभाव।
दाम्पत्य संतान को प्रभावित करने के उपाय और सुझाव।
8. आयु: भाव संख्या 8
– आयु पर ग्रहों का प्रभाव।
– आयु को बढ़ाने और दीर्घायु के उपाय और सुझाव।
9.. धन और भाग्य: भाव संख्या 9
– धन और भाग्य पर ग्रहों का प्रभाव।
– धन और भाग्य को बढ़ाने के उपाय और सुझाव।
10. पितृ सुख और राजयोग: भाव संख्या 10
– पितृ सुख और राजयोग पर ग्रहों का प्रभाव।
– पितृ सुख और राजयोग को प्रभावित करने के उपाय और सुझाव।
11. आय: भाव संख्या 11
– आय पर ग्रहों का प्रभाव।
– आय को बढ़ाने और आर्थिक स्थिति में सुधार के उपाय और सुझाव।
12. व्यय: भाव संख्या 12
– व्यय पर ग्रहों का प्रभाव।
– व्यय को नियंत्रित करने और आर्थिक संतुलन के उपाय और सुझाव।
ग्रहों के द्वारा हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण करना हमें धन और संपत्ति के बारे में अधिक ज्ञान प्रदान कर सकता है। यहां दिए गए 12 भावों के माध्यम से आप अपनी आर्थिक स्थिति को समझ सकते हैं और आवश्यकतानुसार उपाय अपना सकते हैं। ज्योतिष के माध्यम से आप अपने जीवन की योजना बना सकते हैं और धन और संपत्ति को बढ़ा सकते हैं।
आज हम आपके सामर्थ्य और सफलता के माध्यम सरस्वती योग के बारे में चर्चा करेंगे। यह एक शक्तिशाली योग है जो ज्ञान, विद्या, कला और साहित्य को संचालित करने में मदद करता है।
सरस्वती योग की विशेषताएं और इसके फलों को समझने के लिए, आइए इस योग की गहराईयों में खुद को ले चलें।
यदि बुध, बृहस्पति, शुक्र लग्न से 9 या द्वितीय स्थान में हों और केन्द्र ( 1,4,7,10) कोण (5, बृहस्पति स्वराशि मित्र राशि या उच्च राशि में बलवान् हो तो ‘सरस्वती’ योग होता है।
सामर्थ्य और सफलता का अद्भुत संगम: सरस्वती योग, जो ज्ञान, कला और साहित्य का प्रतीक है, एक अद्भुत संगम का प्रतिष्ठान करता है। यह योग व्यक्ति को बेहतरीन तरीके से कामयाब बनाने में सहायता करता है और उसे अद्भुत बुद्धि और कलात्मक योग्यता प्रदान करता है।
सरस्वती योग के संचालन के फलस्वरूप, व्यक्ति में आत्मविश्वास, स्वावलंबन, उच्च स्तर की विद्यालयिक शिक्षा और व्यापारिक सफलता का सम्पूर्ण विकास होता है।
सरस्वती योग के लाभ: सरस्वती योग के संचालन से व्यक्ति को बुद्धि और कलात्मक योग्यता की वरदान मिलती है। यह योग न सिर्फ उच्च स्तर की विद्यालयिक शिक्षा में सुधार करता है, बल्कि उसे कला, संगीत, साहित्य और भूगोलिक ज्ञान में अद्वितीय अवसर प्रदान करता है।
यह योग व्यक्ति की मौखिक और लेखनीय क्षमताओं को विकसित करता है, जिससे वह सफलता की सीमाओं को पार कर सकता है।
सरस्वती योग का प्रभाव और फलदायी क्षेत्र: सरस्वती योग का प्रभाव अस्तित्व, ज्ञान, कला, संगीत, साहित्य, वाणी, अभिव्यक्ति और शिक्षा के क्षेत्रों में खास रूप से दिखाई देता है।
यह योग विद्यार्थियों को परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करने में सहायता करता है और उन्हें उच्चतम शिक्षा के लिए अवसर प्रदान करता है।
इसके साथ ही, यह योग कलात्मक लोगों को उनके कला की विस्तृत स्वरूपता को समझने में मदद करता है और उन्हें उच्चतम स्तर पर विकसित करने में सक्षम बनाता है।
सरस्वती योग की महत्वपूर्ण बातें:
सरस्वती योग मन की शांति, बुद्धि की प्रगति और आत्म-संवेदना के साथ साथ अद्वितीय बुद्धि का संचालन करता है।
यह योग अविश्वसनीय ज्ञान, विवेक और सहज बुद्धि को विकसित करता है जो सभी क्षेत्रों में व्यापक सफलता के लिए आवश्यक होता है।
यह योग व्यक्ति के मन को शुद्ध, स्थिर और अधिक उत्साही बनाता है, जिससे उसे कला और साहित्य में आविष्कार करने का जोश मिलता है।
सरस्वती योग के अभ्यास से व्यक्ति की संवेदनशीलता, अभिव्यक्ति क्षमता, अद्वितीयता और सृजनशीलता में सुधार होता है।
यह योग व्यक्ति को स्वतंत्र, सहज और स्थिर सोचने की क्षमता प्रदान करता है और उसे सफलता की ऊँचाइयों को छूने के लिए मदद करता है।
जिस व्यक्ति की जन्म- कुण्डली में सरस्वती योग हो वह बहुत बुद्धिमान्, नाटक, गद्य, पद्य ( काव्य ) अलंकार शास्त्र तथा गणित शास्त्र में महान् पटु और विद्वान् होता. है ।
काव्य रचना, प्रबन्ध (सुन्दर लेख या सुन्दर पुस्तक लेखन) तथा’ शास्त्रार्थ में भी एसा व्यक्ति पारंगत (पूर्ण पंडित) होता है । तीनों लोकों में उसकी कीर्ति फैलती है। अति धनी होता है ।
अमिताभ बच्चन की कुंडली
जन्मतिथि: 11 अक्टूबर 1942
जन्मस्थान: उत्तर प्रदेश, भारत
कुंडली में सरस्वती योग की मौजूदगी है। इस योग ने उन्हें अद्वितीय अभिनय क्षेत्र में अमिताभ बनने का मौका दिया है। उन्होंने अपने करियर में महानता हासिल की है और उन्हें एक आदर्श अभिनेता के रूप में मान्यता मिली है।
सरस्वती योग, ज्ञान और कला के अद्भुत संगम को प्रकट करने वाला एक शक्तिशाली योग है। इसका प्रयोग करके हम अपनी बुद्धि, कला और साहित्य की क्षमताओं को समृद्ध कर सकते हैं।
यह योग हमें जीवन में सफलता की ओर अग्रसर करता है और हमें एक उच्चतर और प्रशस्त सामर्थ्य स्तर तक पहुंचने में सहायता करता है। तो आइए, हम सभी इस योग का अभ्यास करके ज्ञान और कला के अद्भुत संगम का आनंद उठाएं और अपने सामर्थ्य और सफलता को महकाएं।
ग्रह अपने सर्वोच्च राशि में उच्च समझा जाता है। वह अपनी स्वयं की राशि में सुखप्रद माना जाता है। ग्रह अपनी स्वयं की नक्षत्र में स्वस्थ माना जाता है।
अगर ग्रह किसी मित्र के घर में है, दयालु ग्रहों की श्रेणी में है, और दयालु ग्रह से संबंधित है, तो इसे शांतिपूर्ण कहा जाता है। जब ग्रह का चक्र भूमि से दिखाई देता है (यानी यह सूर्य के निकटता के कारण छिपा हुआ नहीं है), तो इसे शक्तिशाली ग्रह कहा जाता है, जिसका मतलब है कि इसकी सकारात्मक प्रभाव दिखाने की क्षमता होती है।
एक छिपा हुआ ग्रह बहुत अनुकूल नतीजे दिखाता है। वह इतना कमजोर होता है कि वह कुछ अच्छा करने की क्षमता नहीं रखता। एक छिपा हुआ ग्रह को दुर्बल माना जाता है, अर्थात अगर वह छिपा हुआ नहीं होता है, तो यह शक्तिशाली होता है, और यदि वह छिपा हुआ होता है, तो यह दुर्बल माना जाता है।
एक ग्रह जिसे किसी अन्य ग्रह द्वारा “पराजित” किया गया है, उसे पीड़ित कहा जाता है। दुश्मन के घर में स्थित ग्रह को पूरी तरह से विक्षिप्त कहा जाता है, और अपनी दुर्बल राशि में स्थित ग्रह को गंभीरतापूर्ण पीड़ाप्राप्त कहा जाता है। आमतौर पर, जैसा कि कहा गया है, ग्रहों की अवस्थाएं निम्नानुसार होती हैं:
एक ग्रह जिसे “पराजित”(हारा हुआ) कहा गया है – जब दो ग्रह एक ही राशि में हों, अलग-अलग डिग्री पर, तो माना जाता है कि दो ग्रह एक दूसरे के साथ विरोध में हैं, और स्थानिक शक्ति और कालिक शक्ति के हिसाब से मजबूती की गणना की जानी चाहिए।
छः प्रकार की मजबूती के संयोजन को शद्बल कहा जाता है (1) स्थानिक शक्ति, (2) कालिक शक्ति, (3) दिशायी शक्ति, (4) राशि शक्ति, (5) चालक शक्ति, और (6) प्राकृतिक शक्ति। हालांकि, युद्ध में मजबूती की गणना के लिए, (1), (2) और (3) का संयोजन किया जाता है।
युद्ध में दो ग्रहों की मजबूती की गणना करने के लिए, मजबूतियों को तुलना करें और मजबूती की कमजोर मजबूती से घटाएं। बचे हुए को दो ग्रहों के बीच डिग्री के अंतर से विभाजित करें।
प्राप्त परिणाम को उत्तर के अनुसार ग्रह की मजबूती में जोड़ें, जो कि उत्तर सकारात्मक हो तो उत्तर दिशा का है और यदि परिणाम नकारात्मक हो तो दक्षिण दिशा का है। उत्तर में स्थित ग्रह को विजेता माना जाता है, और दक्षिण में स्थित ग्रह को हारे हुए माना जाता है।
यह समझना चाहिए कि पहले छः अवस्थाओं में ग्रह सकारात्मक परिणाम देता है। उच्च अवस्था में, इसे 16 अंक मिलते हैं, सुखप्रद अवस्था में 14 अंक मिलते हैं, स्वयं की राशि में 12 अंक मिलते हैं, मित्र की राशि में 10 अंक मिलते हैं, शांतिपूर्ण स्थिति में 8 अंक मिलते हैं, और शक्तिशाली स्थिति में 6 अंक मिलते हैं।
दुखद अवस्था में, इसे 6 अंक अनुकूल परिणाम मिलते हैं, दुर्बल अवस्था में 8 अंक अनुकूल परिणाम मिलते हैं, गंभीर पीड़ाप्राप्त अवस्था में 10 अंक अनुकूल परिणाम मिलते हैं, और पूरी तरह से विक्षिप्त अवस्था में 12 अंक अनुकूल परिणाम मिलते हैं।
अच्छी स्थिति के साथ एक ग्रह के आयाम में, ग्रही अवधि और उप-अवधि में सकारात्मक परिणाम होंगे। दुर्बल स्थिति के साथ एक ग्रह के आयाम में, ग्रही अवधि और उप-अवधि में अनुकूल परिणाम होंगे।
आयुष्मान योग: लंबी जीवन, सुख और समृद्धि का मार्ग इन 3 राशियों के लिए!
आयुष्मान योग, 27 योगों में तीसरा योग है। इसका प्रभाव आमतौर पर “लंबी आयु वाला” या लंबी जीवन वाला वर्णन किया जाता है
आयुष्मान योग को सबसे शुभ योग माना जाता है। चंद्रमा सत्तारूढ़ भगवान की उपाधि रखता है, केतु शासक ग्रह है।
आयुष्मान योग के दौरान जन्मे जाने वाले व्यक्ति को लंबी जीवन की प्राप्ति होती है, जिसका मतलब है कि उसे औसत तुलना में दूसरे लोगों की तुलना में अधिक समय और खुशहाल जीवन का आनंद मिलेगा।
ऐसे व्यक्ति विभिन्न पकवानों का शौकीन हो सकते हैं और यात्रा करने के लिए प्यार कर सकते हैं। उन्हें कविता और संगीत में रुचि हो सकती है और वे अपना पेशा भी इन क्षेत्रों में चुन सकते हैं।
वे अपने काम में बहुत संकल्पित होते हैं और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयासशील होते हैं। वे शारीरिक रूप से मजबूत होते हैं।
मेष राशि: ऐश्वर्य पूर्ण होगा।
कर्क राशि: ज्ञान और शिक्षा में सफलता।
वृश्चिक राशि: वित्तीय स्वतंत्रता और प्रोफेशनल सफलता।
यह तीन राशियां ज्योतिष द्वारा कहे गए आयुष्मान योग के तहत आनंद, समृद्धि और लंबी जीवन की वरदान प्राप्त करती हैं। आइए, हम इस ब्लॉग में आयुष्मान योग के तहत जन्मे व्यक्तियों की विशेषताओं को जानें और जांचें कि यह कैसे तीन विशेष राशियों पर प्रभाव डालता है: मेष, कर्क और वृश्चिक।
आयुष्मान योग के दौरान जन्मे व्यक्तियों की विशेषताएं में विविधता खोजने वाले व्यंजनों से प्यार, यात्रा करने का शौक और काव्य और संगीत में रुचि शामिल हैं।
इन क्षेत्रों में व्यापार करने वाले व्यक्तियों के रूप में इन्होंने इन्हें अपना कार्य चुना है, जो उनकी अटूट संकल्पना, दृढ़ता और शारीरिक मजबूती के साथ संगत है।
मेष राशि के लोगों के लिए, आयुष्मान योग कार्य और करियर में उद्यम के लिए अद्भुत लाभ लाएगा। जो भी लोग जन्मकुंडली के माध्यम से आयुष्मान योग का निर्माण करते हैं, उन्हें इस दिन उच्च लाभ होगा।
उनके कार्यस्थल पर उनकी प्राधिकारियां काफी प्रभावित होंगी और उनके लिए नई संभावनाएं खुलेंगी, जो उनके करियर को और उन्नत करने के लिए मददगार होंगी।
मेष राशि में इन्हें प्राकृतिक शक्ति और शक्ति हासिल होती है, इसलिए यह उनकी सफलता के लिए निश्चित रूप से सहायक होगा।
कर्क राशि के जातक, विशेष रूप से जब उनके जन्मकुंडली में एक अच्छी दशाओ वाली गुरु की होती है, तो आयुष्मान योग से अत्यंत लाभान्वित होंगे।
कर्क राशि में गुरु की उच्चता और चंद्रमा के प्रभाव के कारण यह आशीर्वाद औरते हैं। यदि कोई व्यक्ति शिक्षा क्षेत्र में या रहस्यवादी विज्ञान में संलग्न है, तो उसे इस योग के द्वारा अत्यधिक आशीर्वाद प्राप्त होगा और इस योग के दौरान किए गए कोई भी प्रयास सफल होंगे।
ज्ञान का कारक गुरु कर्क राशि के जातकों को अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वृश्चिक राशि के जातकों के लिए, आयुष्मान योग जीवन के विभिन्न पहलुओं में समृद्धि लाता है। वे न केवल एक लंबी जीवन का आनंद उठाते हैं, बल्कि चंद्रमा वृश्चिक राशि के लिए 9वें भाव के स्वामी बन जाता है।
आर्थिक स्वतंत्रता और लाभ उनके हाथ में होते हैं और वे अपने व्यापार में अच्छा विकास करते हैं, अपनी बुद्धिमत्ता और ज्ञान का उपयोग करके। वे अपने संसाधनों और सामाजिक नेटवर्क का लाभ उठाते हैं और पेशेवर विकास और सकारात्मक करियर समाचार प्राप्त कर सकते हैं।
आयुष्मान योग की शक्ति के साथ, इन तीन राशियों पर लंबी आयु, सुख और समृद्धि का वरदान है, जो एक ब्रह्मांडिक घटना है और खोजने लायक है। हमसे जुड़ें इस परिवर्तनकारी यात्रा में और जीवन के सुख-शांति की ओर बढ़ें!
प्रीति योग, संस्कृत शब्दों से लिया गया है, एक योगाभ्यास है जो जीवंतता, जिज्ञासा और खेल की भावना की सार को प्रतिष्ठित करता है। इसके अभ्यासक जीवंत ऊर्जा और सभी रूपों में सौंदर्य के गहरे सम्पूर्णता को पहचानते हैं।
प्रीति योग न केवल विपरीत लिंग के साथ सुहावने संबंध को पोषण करता है, बल्कि व्यक्ति को उसकी चालाकी को संभालकर अभिव्यक्ति करने और सफलता की ओर सफलतापूर्वक प्रयास करने की क्षमता भी प्रदान करता है। इस ब्लॉग में, हम प्रीति योग के परिवर्तनात्मक गुणों का अन्वेषण करेंगे और यह जांचेंगे कि इसका व्यक्तिगत और पेशेवर यात्रा पर क्या प्रभाव हो सकता है।
जीवंतता और जिज्ञासा को गले लगाना: प्रीति योग अभ्यासक जीवंतता और जीवन के प्रति एक उत्साह से चमकते हैं। गतिशील और ऊर्जावान योग आसनों के माध्यम से, प्रीति योग व्यक्ति के अंदर की ऊर्जा को प्रज्वलित करता है, जिससे उसके चारों ओर एक जीवंत आभा उत्पन्न होती है।
यह अभ्यास व्यक्तियों को अपनी जिज्ञासा की प्राकृतिकता को ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित करता है, जबकि वे नई अनुभवों और ज्ञान के प्रति खुले रहते हैं।
प्रीति योग 27 योगों में दूसरा योग है। इसका नाम ही जीवंतता, जिज्ञासा और खेलने की भावना को दर्शाता है। इस योग के तहत जन्मे व्यक्ति सौंदर्य की गहरी प्रशंसा करते हैं।
वे स्वाभाविक रूप से विपरीत लिंग की ओर आकर्षित होते हैं और आसानी से महत्वपूर्ण संबंध बना सकते हैं। इनकी चतुराई और अंदाज़ से, सफलता जीवन में प्राप्त करना उनके लिए संभव होता है।
प्रीति योग को तिथि, दिन और नक्षत्र के संयोग से बनाया जाता है, जिससे यह एक अद्वितीय ब्रह्माण्डिक घटना बन जाती है।
प्रीति योग का महत्व: ज्योतिषियों द्वारा प्रीति योग के महत्व को व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त है, और इसे पवित्र कार्यों के लिए अत्यधिक शुभ माना जाता है।
प्रीति योग के दौरान आरम्भिक किसी भी कार्य, योजना, परियोजना या आयोजन को सकारात्मक परिणाम देने की उम्मीद होती है। इस दिव्य योग ने अपने लाभार्थियों को सुखद वैवाहिक और पति-पत्नी जीवन प्रदान करके खुशहाली और पूर्णता सुनिश्चित की है।
मेष राशि: 2023 में प्रीति योग के दौरान मेष राशि के जातकों के लिए यह एक खुशखबरी है। इस शुभ दिन को आरंभ किया जाने वाला कोई भी परियोजना, काम या उद्यम अपार फल प्रदान करेगा।
वित्तीय लाभ और अप्रत्याशित धन उनके दरवाजों पर दस्तक दे सकते हैं। नियमित नौकरी से उद्यमप्रियता में जाने की सोच रहे लोगों के लिए, यह योग समर्पित अवसर प्रदान करता है। वैवाहिक सुख आ रहा है, क्योंकि संबंध में सुधार हो रहा है, और शांति और समृद्धि कायम होती है।
कन्या राशि के व्यक्ति प्रीति योग के दौरान सामग्रीशील अनुभव की ओर संपूर्णता के साथ जा सकते हैं। चाहे वह प्रतियोगी परीक्षाओं हों या परिणामों की प्रतीक्षा कर रहें हों, सफलता निश्चित है।
जो भी उनके हाथ में होगा, उससे सफलता या लाभ की कोई न कोई रूप मिलेगा। इस सोने जैसे अवसर को उन्हें व्यर्थ नहीं करना चाहिए। जीवनसाथी के साथ किसी विवाद का समाधान मिलेगा, और वैवाहिक जीवन पहले से भी शांतिपूर्ण और संतोषजनक हो जाएगा।
धनु राशि के जातक प्रीति योग 2023 में आर्थिक लाभ के लिए लाभदायक अवसर प्राप्त करेंगे। अगर पैसा कहीं अटका हुआ है, तो इसे प्राप्त करने की संभावनाएं हैं।
वित्तीय कठिनाइयों का सामना कर रहे लोग अप्रत्याशित धन स्रोतों का पता लगा सकते हैं। इसके अलावा, यह एक समृद्धि की प्रारंभिक शुभकाल है अपने परिवार या साथी को आधिकारिक रूप से परिचय कराने के लिए, जिससे जीवनभरी प्रतिबद्धता की स्वस्थ शुरुआत हो सके।
प्रीति योग 2023 में मेष, कन्या और धनु राशि के जातकों के लिए आर्थिक समृद्धि और सुखद संबंधों की उम्मीद है। इस अलौकिक संयोग को अपनाएं और आपके आसपास शुभ ऊर्जा का समर्पण करें।
याद रखें, प्रीति योग ब्रह्मांड से एक मूल्यवान उपहार है, जो आपको अपने सपनों और अपेक्षाओं को साकार करने का अवसर प्रदान करता है। इसलिए, आशा के साथ इस वर्ष में आगे बढ़ें और स्वयं को उम्मीदवारों की प्रचुर आशीर्वादों के लिए खोलें जो आपका इंतज़ार कर रहे हैं।
अब हम आपको प्रत्येक ग्रह के स्वरूप और प्रकृति के बारे में बताएंगे। इसका उद्देश्य क्या है? यदि जन्मकुंडली में कोई ग्रह होता है, तो उसी ग्रह के गुण और प्रकृति के अनुसार जातक की प्रकृति होती है।
जैसे जिसके लग्न में मंगल होता है, उसकी प्रकृति में उग्रता, साहस, रणप्रियता और अन्य गुण आएंगे। मंगल जिस राशि में स्थित होता है, उसका भी बहुत प्रभाव पड़ता है। यदि मंगल बलवान होता है, तो व्यक्ति शूरवीर सेनापति की तरह लड़ सकता है, और यदि मंगल दुर्बल और पाप पीड़ित होता है, तो उसके प्रतिकूल लड़ाई में बहुत मूल्य हो सकता है।
जब कोई ग्रह जन्मकुंडली में नहीं होता है, तो उस व्यक्ति की प्रकृति, स्वभाव और गुण लग्नेश के तरह होते हैं। इसलिए प्रत्येक ग्रह की प्रकृति, स्वभाव आदि जानना आवश्यक है। जो ग्रह लग्न को देखते हैं, वह अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार जातक को प्रभावित करते हैं।
इसके अलावा, जो ग्रह रोग पीड़ित या बीमार करता है, उसी ग्रह की प्रकृति और दोष जनित रोग होगा। उदाहरण के लिए, सूर्य पित्त रोग करेगा और शनि वात रोग करेगा। इन सभी बातों को समझने के लिए हम सातों ग्रहों के गुण, प्रकृति, स्वभाव आदि को नीचे बता रहे हैं।
सूर्य की प्रकृति
सूर्य की पित्त प्रकृति होती है, जिसकी अस्थियाँ मजबूत होती हैं, उसके थोड़े केश (सिर के बाल) होते हैं। इसकी आकृति रक्त-श्याम (कुछ स्याही लिए हुए लाल) होती है।
इसके नेत्र की पुतलियाँ शहद की तरह कुछ भूरापन और लाली लिए हुए होती हैं; इसकी आकृति चौकोर होती है; इसकी भुजाएं विशाल होती हैं। स्वभाव से सूर्य शूर और प्रचण्ड होता है, यह लाल वस्त्र धारण किए हुए होता है।
चन्द्रमा की प्रकृति
चन्द्रमा का शरीर स्थूल (बड़ा) होता है। वह युवावस्था का और प्रौढ़ावस्था का भी होता है; उसका शरीर सफेद और कमजोर होता है; उसके सिर के केश सूक्ष्म और काले होते हैं; उसके नेत्र बहुत सुंदर होते हैं; उसके शरीर में रक्त की प्रधानता होती है; अर्थात् शरीर रक्त प्रवाह पर चन्द्रमा का आधिपत्य होता है।
चन्द्रमा की वाणी मृदु होती है और गौर वर्ण वाला सफेद वस्त्र पहनने वाला होता है। यह मृदु (मुलायम) होता है – शरीर से भी, स्वभाव से भी! त्रिदोषों में कफ और वात पर इसका विशेष अधिकार होता है, अर्थात् चन्द्रमा अपनी अन्तर्दशा में वात रोग या कफ रोग या वात-कफात्मक रोग उत्पन्न करेगा।
मंगल की प्रकृति
मंगल मध्य में कृश होता है, जिसका अर्थ है कि उसकी पतली कमर होती है। उसके सिर के बाल घुंघराले और चमकीले होते हैं। उसकी दृष्टि में क्रूरता होती है और वह स्वभाव से भी उग्र बुद्धि वाला होता है। यह पित्त प्रधानता वाला होता है। वह लाल वस्त्र पहनता है और उसका शरीर भी लाल रंग का होता है।
यह स्वभाव से प्रचण्ड और अत्यंत उदार होता है, और शरीर की मज्जा उसका विशेष अधिकार होता है। जिसकी जन्मकुण्डली में मंगल बलवान होता है, उसकी मज्जा भी बलवान होती है; जबकि जिसका मंगल निर्बल होता है, उसकी मज्जा निर्बल होती है।
मंगल तरुण अवस्था में होता है, अर्थात् यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में बलवान मंगल लग्न में होता है, तो वह पचास वर्ष की उम्र में भी ३० वर्ष के समान प्रतीत होगा।
बुध की प्रकृति
अब बात करते हैं बुध के स्वरूप और प्रकृति की। बुध के शरीर की कांति नवीन दूब के समान होती है। इसमें वात, पित्त, कफ, त्रिदोषों का संयोजन होता है। यदि बुध जन्मकुण्डली में पीड़ित होता है, तो वह अपनी दशा-अन्तर्दशा में वायु, कफ और पित्त से उत्पन्न तीन प्रकार के रोग पैदा कर सकता है। यह नसों से जुड़ा होता है (यानी कि शरीर में जो नर्वस सिस्टम होता है, उसका अधिष्ठाता बुध होता है)। यदि बुध पीड़ित होता है, तो नर्वस सिस्टम में खराबी होगी। बुध स्वभाव से मधुर वाणी वाला होता है।
इसके शरीर के अंग सुडौल होते हैं, जैसा कि होना चाहिए। बुध मज़ाकिया होता है। जिन महिलाओं या पुरुषों की कुण्डलियों में बुध चंद्रमा से युक्त होता है, वे कुछ न कुछ मनोरंजन की बातें बोलते रहते हैं। जैसे कि मंगल में मज्जा प्रधान होती है, ठीक वैसे ही बुध त्वचा प्रधान होता है, यानी शरीर के सबसे ऊपरी त्वचा को। अच्छे बुध होने से त्वचा भी अच्छी होती है, जबकि बुध दोषयुक्त होने से त्वचा में रोग हो सकते हैं। बुध के नेत्र लंबे होते हैं और वह हरी वस्त्र पहनता है। यह बुध का संक्षिप्त वर्णन है। अब बृहस्पति के बारे में चर्चा करते हैं।
बृहस्पति की प्रकृति
बृहस्पति ग्रह का वर्ण पीला होता है, लेकिन उसके नेत्र और सिर के बालों में कुछ भूरापन होता है। इसकी छाती मजबूत और ऊँची होती है, और उसका शरीर भी बड़ा होता है। यह कफ प्रकृति का ग्रह होता है। वैद्यक शास्त्र में कफ प्रकृति वाले लोगों के लक्षण बताए जाते हैं, और वे लक्षण उस व्यक्ति में प्रकट होते हैं जिसकी कुंडली में बलवान बृहस्पति लग्न में होता है या वह नवांश का स्वामी होता है।
मनुष्य बहुत बुद्धिमान होता है; बुध से भी बृहस्पति की शक्ति होने से बुद्धि की प्रशंसा की जाती है, और बृहस्पति से भी। जब दोनों ही से बुद्धि की चर्चा की जाती है, तो उनका तारतम्य क्या होगा? बुध से किसी बात को शीघ्र समझना, किसी विषय का शीघ्र ही हृदयंगम हो जाना आदि की बात करनी चाहिए। लेकिन श्रेष्ठ मति होना बृहस्पति का लक्षण है। इसलिए उसे देवताओं का गुरु कहा जाता है।
बृहस्पति की वाणी शेर या शंख के तरह गम्भीर होती है। यह धन प्रधान ग्रह है, अर्थात धन कारक है। यदि कुंडली में बृहस्पति अच्छा होता है, तो मनुष्य धनी होता है। जब बृहस्पति अनुकूल गोचर में होता है, तो उससे धन की प्राप्ति होती है। जब जन्मकुंडली में बृहस्पति पापाकृांत होता है, अर्थात पाप ग्रहों के प्रभाव में होता है, तो धन का नाश होता है। यह सब संस्कृत के शब्द “वसुप्रधानः” में संकेत द्वारा बताया गया है। बृहस्पति से विचार करने की शक्ति दृढ़ होती है।
शुक्र की प्रकृति
शुक्र ग्रह का स्वरूप और लक्षण इस प्रकार होते हैं: यह रंग-बिरंगे कपड़े पहने होता है, काले और घुघराले केश होते हैं, शरीर और अवयव मोटे होते हैं। इसकी प्रकृति कफ और वात की प्रधानता वाली होती है। इसके शरीर की रौशनी उज्ज्वल होती है (बुध के मुकाबले दुर्बल होने के कारण जो अधिक गहरे हरे रंग की होती है)।
शुक्र को दूब के अंकुर के समान उज्ज्वल शरीर कहा जाता है। इसकी विशाल आंखें होती हैं और इसका वीर्य पर विशेष आधिपत्य होता है। वीर्य को शुक्र कहा जाता है, क्योंकि शुक्र ग्रह वीर्य का स्वामी होता है। जब शुक्र अष्टम भाव में होता है, तो आमतौर पर वीर्य रोग होते हैं।
शनि की प्रकृति
अब शनि ग्रह का स्वरूप बताते हैं: यह लंगड़ा होता है (शनि द्वादश भाव में होने या शनि के विशेष प्रभाव के कारण पैरों में विकार होता है)। इसकी आंखें नीचे की तरफ होती हैं। शरीर लंबा पर कृश होता है। नसें बहुत होती हैं। यह स्वभाव से आलसी होता है, और इसका शरीर काला होता है। वायु तत्व की प्रधानता होती है।
यह स्वभाव से कठोर हृदय और चुगलखोर होता है। इसे मूर्ख माना जाता है, इसके दांत और नाखून मोटे होते हैं। इसके शरीर के अवयव भयानक और वृद्ध दिखाई देते हैं और यह तमोगुण की प्रभावित होता है। इसकी रोम भी कठोर होती हैं। यह अपवित्र होता है और क्रोधी होता है। यह काले वस्त्र पहने होता है। इसके विशेष लक्षण पाये जाते हैं।
ब्रह्मांड में ग्रहों की दृष्टि होती है। प्रत्येक ग्रह अपनी स्थिति से अन्य राशि या राशियों पर या उस राशि-स्थित ग्रहों पर दृष्टि डालता है। इसका मतलब है कि प्रत्येक ग्रह का चमकता हुआ प्रकाश राशि चक्र के किसी न किसी खंड पर पड़ता है, जिसे हम दृष्टि कहते हैं।
इसलिए सूर्य, चंद्रमा, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि ग्रहों की स्थित राशि से सप्तम राशि पर पूर्ण दृष्टि होती है। इसके अलावा, मंगल को चतुर्थ और अष्टम राशियों पर भी पूर्ण दृष्टि होती है।
वृहस्पति को नवम और पंचम राशियों पर भी पूर्ण दृष्टि होती है और शनि को तृतीय और दशम राशि पर पूर्ण दृष्टि होती है। इसका मतलब है कि सूर्य, चंद्रमा, बुध और शुक्र की अपनी स्थिति से केवल सप्तम राशि में ही पूर्ण दृष्टि होती है।
मंगल की चतुर्थ, सप्तम और अष्टम राशियों पर, बृहस्पति की पंचम, सप्तम और नवम राशियों पर और शनि की तृतीय और दशम राशियों पर पूर्ण दृष्टि होती है।
अब पुनः प्रश्न यह उठता है कि क्या इनके सिवा अन्य राशियों पर भी दृष्टि होती है या नहीं। इसका निर्णय इस प्रकार किया गया है कि मंगल को छोड़कर शेष ६ ग्रहों को चतुर्थ और अष्टम राशियों पर तीन पाद (३) दृष्टि होती है, मंगल की चतुर्थ और अष्टम पर पूर्ण दृष्टि होती है जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है।
इसलिए मंगल को तीन पाद (३) दृष्टि नहीं होती है। फिर भी लिखा है कि बृहस्पति के अतिरिक्त शेष ६ ग्रहों को नवम और पंचम राशि में द्विपाद दृष्टि होती है। स्मरण रहे कि बृहस्पति को नवीं और पांचवी पर पूर्ण दृष्टि होती है। अतएव वृहस्पति की द्विपाद (३) दृष्टि किसी राशि पर नहीं होती है।
अंत में कहा है कि शनि के अतिरिक्त अन्य सभी ग्रहों को तृतीय और दशम राशि पर एकपाद (३) अर्थात् दृष्टि होती है। यहाँ भी शनि को तृतीय और दशम राशि में एकपाद दृष्टि नहीं कहा है क्योंकि इन पर इसकी पूर्ण दृष्टि होती है। यदि देखना चाहें कि किसी ग्रह की दृष्टि किस-किस राशि या राशियों पर होती है, तो उपरोक्त नियमों के अनुसार विचार करें।
उदाहरण के तौर पर, सूर्य की पूर्ण दृष्टि सप्तम राशि पर होती है और यदि सप्तम राशि में अन्य ग्रह भी हैं, तो उन ग्रहों पर भी उसी ग्रह की दृष्टि होती है। इसी तरह, अन्य राशियों में भी ग्रहों पर उसी ग्रह की दृष्टि होती है जिनमें वे स्थित हैं। ऊपर लिखा जा चुका है कि अमुक ग्रह की अमुक राशि पर पूर्ण दृष्टि, त्रिपाद दृष्टि (३), द्विपाद दृष्टि (३) अथवा एकपाद दृष्टि (४) होती है। यदि उन राशियों में ग्रह भी रहते हैं, तो उन ग्रहों पर भी दृष्टि होती है।